शहाबगंज में पंचायत सहायकों की कार्यप्रणाली पर सवाल, रोहाखी-खखड़ा में भवन बंद; मबारकपुर और खखड़ा में परिजनों के जरिए काम कराने का आरोप
चयन प्रक्रिया से लेकर निगरानी व्यवस्था तक उठे सवाल, छह हजार मानदेय के बावजूद जिम्मेदारियों से दूरी का आरोप
चन्दौली एक्सप्रेस, इलिया।
ग्रामीणों को गांव स्तर पर सरकारी सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाए गए पंचायत भवनों की व्यवस्था शहाबगंज विकासखंड में सवालों के घेरे में है। रोहाखी और खखड़ा ग्राम पंचायतों में पंचायत भवनों के नियमित रूप से नहीं खुलने और पंचायत सहायकों के मौके पर मौजूद नहीं मिलने की शिकायतें सामने आई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जरूरी कार्यों के लिए उन्हें पंचायत सहायकों से संपर्क करने के लिए मोबाइल नंबरों का सहारा लेना पड़ता है।
पंचायत भवनों में जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, परिवार रजिस्टर की नकल, सरकारी योजनाओं से जुड़े आवेदन, ऑनलाइन सेवाएं और पंचायत स्तर के कई महत्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं। लेकिन सुविधा के लिए बनाए गए भवनों पर ताला लटकने से ग्रामीणों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इससे पंचायत व्यवस्था और उसकी निगरानी प्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

रोहाखी और खखड़ा में पंचायत भवन बंद मिलने की शिकायत
ग्रामीणों का आरोप है कि रोहाखी और खखड़ा ग्राम पंचायतों में पंचायत भवन नियमित रूप से नहीं खुलते हैं। कई बार ग्रामीण जरूरी कार्यों के लिए पंचायत भवन पहुंचते हैं, लेकिन वहां ताला लटका मिलता है। इससे ग्रामीणों को प्रमाण पत्र, आवेदन और अन्य पंचायत संबंधी कार्यों के लिए परेशान होना पड़ता है।
ग्रामीणों का कहना है कि जिस उद्देश्य से पंचायत भवनों का निर्माण कराया गया था, यदि उसी स्थान पर जिम्मेदार कर्मचारी उपलब्ध नहीं रहेंगे तो ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं और सेवाओं का लाभ कैसे मिलेगा
खखड़ा और मुबारकपुर में पंचायत सहायकों की कार्यप्रणाली पर सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि खखड़ा और मुबारकपुर ग्राम पंचायतों में चयनित पंचायत सहायक नियमित रूप से पंचायत भवन पर उपस्थित नहीं रहती हैं। जरूरत पड़ने पर ग्रामीणों को पंचायत सहायक से संपर्क करने के लिए मोबाइल नंबरों का सहारा लेना पड़ता है।
आरोप है कि कई बार पंचायत सहायक स्वयं पंचायत भवन पहुंचकर कार्य करने के बजाय अपने परिजनों के माध्यम से पंचायत भवन से जुड़े काम कराती हैं।
ग्राम पंचायत मुबारकपुर में पंचायत सहायक डॉली की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। ग्रामीणों के अनुसार उनका करीब दो वर्ष पहले विवाह हो चुका है और वह ससुराल में रहती हैं। आरोप है कि जरूरत पड़ने पर उनके स्थान पर उनके भाई के माध्यम से पंचायत भवन से संबंधित कार्य कराया जाता है।
वहीं खखड़ा ग्राम पंचायत में भी पंचायत सहायक के नियमित रूप से पंचायत भवन पर नहीं पहुंचने और परिजनों के जरिए कार्य कराए जाने की शिकायत सामने आई है।
यदि चयनित पंचायत सहायक स्वयं अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाती हैं और उनके स्थान पर परिवार के सदस्य सरकारी कार्य करते हैं तो यह गंभीर जांच का विषय है कि आखिर किस नियम और किस अधिकार के तहत ऐसा किया जा रहा है।

चयन प्रक्रिया से गुजरने के बाद भी जिम्मेदारी से दूरी क्यों?
पंचायत सहायकों का चयन कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है। शासन द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार आवेदन लिए जाते हैं। इसके बाद पात्रता की जांच, शैक्षणिक योग्यता और अभिलेखों का सत्यापन किया जाता है। निर्धारित मानकों और मेरिट के आधार पर चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही पंचायत सहायक की नियुक्ति की जाती है।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब चयनित पंचायत सहायक के लिए आवेदन से लेकर सत्यापन और मेरिट तक की पूरी प्रक्रिया अपनाई गई, तो फिर पंचायत भवन की जिम्मेदारी निभाने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति अथवा परिजन की जरूरत क्यों पड़ रही है?
जब काम किसी और के माध्यम से ही कराना था तो फिर आवेदन, चयन प्रक्रिया और नियुक्ति की पूरी कवायद का औचित्य क्या रह जाता है?
पंचायत सहायक के नाम पर चयन, मानदेय किसी के नाम और काम किसी अन्य के भरोसे चलने की शिकायतें सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
छह हजार रुपये मानदेय, फिर भी निगरानी पर सवाल
पंचायत सहायकों को शासन की ओर से प्रतिमाह छह हजार रुपये मानदेय के रूप में भुगतान किया जाता है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि मानदेय जारी होने से पहले उनकी वास्तविक उपस्थिति और कार्यों का सत्यापन किस स्तर पर किया जाता है।
क्या पंचायत सहायकों की निगरानी की जिम्मेदारी संभालने वाले एडीओ पंचायत, ग्राम पंचायत सचिव और ग्राम प्रधान नियमित रूप से पंचायत भवनों की स्थिति और कर्मचारियों की उपस्थिति की जांच करते हैं?
यदि पंचायत भवन बंद मिल रहे हैं, चयनित पंचायत सहायक मौके पर नहीं पहुंच रही हैं और परिजनों के माध्यम से कार्य कराने की शिकायतें सामने आ रही हैं तो फिर निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब यह भी जांच का विषय है कि ऐसी लापरवाही करने वाले पंचायत सहायकों के खिलाफ विभाग ने अब तक कितनी बार कार्रवाई की है? कितने मामलों में नोटिस जारी किए गए? कितने पंचायत सहायकों का मानदेय रोका गया या कटौती की गई?
कागजों में व्यवस्था दुरुस्त, धरातल पर ताले
कागजों में पंचायत व्यवस्था भले ही पूरी तरह दुरुस्त दिखाई दे रही हो, लेकिन धरातल पर पंचायत भवनों पर लटकते ताले और पंचायत सहायकों की अनुपस्थिति की शिकायतें अलग तस्वीर पेश कर रही हैं।
कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकारी व्यवस्था में नाम चयनित कर्मचारी का है, मानदेय भी उसी के नाम से निकल रहा है, लेकिन जिम्मेदारी किसी और के भरोसे चल रही है?
ग्रामीणों ने रोहाखी, खखड़ा, मबारकपुर सहित अन्य ग्राम पंचायतों में औचक निरीक्षण कर पंचायत भवनों की स्थिति, पंचायत सहायकों की उपस्थिति, कार्य विवरण और मानदेय भुगतान से जुड़े अभिलेखों की जांच कराने की मांग की है।
इससे स्पष्ट हो सकेगा कि चयनित पंचायत सहायक वास्तव में अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं या फिर व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित है।
इस संबंध में जिला पंचायत राज अधिकारी अविनाश कुमार से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनका फोन रिसीव नहीं हुआ




