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शहाबगंज ब्लॉक की नई छत पर फिर गुणवत्ता का ग्रहण!

लाखों के मरम्मत कार्य में अहरौरा की दोयम दर्जे की गिट्टी के इस्तेमाल का आरोप, तकनीकी निगरानी पर उठे सवाल

कुछ माह पहले ही हुआ था लाखों का कायाकल्प, फिर टपकने लगी छत; अब दोबारा स्लैब ढलाई में मानकों की अनदेखी का आरोप

चन्दौली एक्सप्रेस शहाबगंज।सरकारी भवनों की मजबूती और गुणवत्ता के नाम पर खर्च होने वाली लाखों रुपये की धनराशि का धरातल पर किस तरह इस्तेमाल हो रहा है, इसकी तस्वीर शहाबगंज विकासखंड कार्यालय परिसर में चल रहे मरम्मत कार्य में देखने को मिल रही है। भवन की मरम्मत के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन मौके पर इस्तेमाल हो रही निर्माण सामग्री की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
विकासखंड कार्यालय परिसर में चल रहे छत निर्माण कार्य में अहरौरा की दोयम दर्जे की गिट्टी के इस्तेमाल का आरोप लगाया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि आरसीसी छत जैसे महत्वपूर्ण निर्माण कार्य में ऐसी सामग्री का प्रयोग भवन की मजबूती पर सवाल खड़ा करता है। जबकि सरकारी निर्माण कार्यों में स्वीकृत प्राकलन के अनुसार निर्धारित मानक और गुणवत्ता वाली सामग्री का प्रयोग किया जाना अनिवार्य होता है।

कुछ माह पहले हुआ था लाखों का काम, फिर क्यों टूटी छत?

शहाबगंज विकासखंड कार्यालय भवन में कुछ माह पहले ही छत की मजैया, रंग-रोगन सहित कई मरम्मत कार्य कराए गए थे। इसके अलावा खंड विकास अधिकारी कार्यालय में पीवीसी पैनल सहित अन्य सौंदर्यीकरण के कार्य भी कराए गए थे।
लेकिन कार्य पूरा होने के कुछ ही समय बाद भवन की छतों से पानी टपकने लगा। इसके बाद अब पुरानी छत को तोड़कर उसी भवन पर दोबारा नया स्लैब डालने का कार्य कराया जा रहा है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कुछ माह पहले हुए लाखों रुपये के कार्य की गुणवत्ता कैसी थी कि इतनी जल्दी भवन को दोबारा मरम्मत की जरूरत पड़ गई? क्या पहले हुए कार्यों की तकनीकी जांच और गुणवत्ता की निगरानी सही तरीके से हुई थी?

प्राकलन में मानक, धरातल पर अलग सामग्री का आरोप

किसी भी सरकारी निर्माण कार्य का प्राकलन तकनीकी मानकों के आधार पर तैयार किया जाता है। इसमें निर्माण सामग्री की गुणवत्ता, मात्रा और दर पहले से निर्धारित रहती है। आरसीसी स्लैब निर्माण में गिट्टी, सीमेंट, बालू और सरिया की गुणवत्ता भवन की मजबूती के लिए सबसे अहम होती है।
तकनीकी जानकारों के अनुसार छत निर्माण में प्रयोग होने वाली गिट्टी मजबूत, साफ और निर्धारित ग्रेड की होनी चाहिए। कमजोर गुणवत्ता वाले एग्रीगेट के इस्तेमाल से कंक्रीट की मजबूती प्रभावित हो सकती है। इससे भविष्य में छत में दरार, सीपेज, पानी रिसाव और भवन की उम्र कम होने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
आरोप है कि इस निर्माण कार्य में दोयम दर्जे की ईंटों से दीवारों की ऊंचाई बढ़ाई गई है। वहीं अब छत निर्माण में भी अहरौरा की दोयम दर्जे की गिट्टी का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिस पर गुणवत्ता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

तकनीकी सवालों के घेरे में निर्माण कार्य

निर्माण कार्य की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी तकनीकी विभाग की होती है। ऐसे में इस कार्य को लेकर कई तकनीकी सवाल खड़े हो रहे हैं

क्या छत निर्माण में प्रयोग की जा रही अहरौरा की गिट्टी की गुणवत्ता की जांच कराई गई है?

क्या गिट्टी का ग्रेड, मजबूती और गुणवत्ता परीक्षण कराया गया है?

क्या मौके पर पहुंचने वाली सामग्री का सत्यापन तकनीकी अधिकारी द्वारा किया गया है?

क्या स्वीकृत प्राकलन में दर्शाई गई सामग्री के अनुसार ही कार्य कराया जा रहा है?

क्या सीमेंट, बालू और गिट्टी का निर्धारित अनुपात (मिक्स डिजाइन) अपनाया जा रहा है?

क्या सरिया की गुणवत्ता, मोटाई और डिजाइन के अनुसार उसकी बिछावट की जांच की गई है?

क्या स्लैब डालने के बाद मानक के अनुसार क्योरिंग कराई जाएगी?

जेई आरईएस नेहा सिंह की निगरानी पर भी सवाल

निर्माण कार्य की तकनीकी निगरानी की जिम्मेदारी जेई आरईएस की होती है। ऐसे में जेई आरईएस नेहा सिंह की भूमिका भी सवालों के घेरे में है।
सवाल—

क्या मौके पर इस्तेमाल की जा रही अहरौरा की गिट्टी वही है, जिसका उल्लेख स्वीकृत प्राकलन में किया गया है?

यदि प्राकलन में निर्धारित गुणवत्ता की गिट्टी और अन्य सामग्री का प्रावधान है और मौके पर उससे अलग या दोयम दर्जे की सामग्री लगाई जा रही है तो क्या इसकी जांच कराई जाएगी?

क्या जेई आरईएस नेहा सिंह ने मौके पर लगी सामग्री की गुणवत्ता की जांच की है?

क्या निर्माण कार्य की मेजरमेंट बुक (एमबी) तैयार करते समय प्राकलन में स्वीकृत सामग्री और मौके पर प्रयोग की गई सामग्री का मिलान किया जाएगा?

यदि कार्य में मानक के विपरीत सामग्री का इस्तेमाल पाया जाता है तो क्या मेजरमेंट में कटौती की जाएगी, भुगतान रोका जाएगा या संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी?

क्योंकि तकनीकी अधिकारी की जिम्मेदारी सिर्फ कार्य की माप लेने तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी होता है कि सरकारी धन से कराया जा रहा निर्माण कार्य स्वीकृत मानक और गुणवत्ता के अनुरूप हो।

अधिकारियों के आवास के सामने हो रहा निर्माण, फिर भी खामोशी क्यों?

सबसे अहम बात यह है कि जिस परिसर में यह निर्माण कार्य चल रहा है, उसी परिसर में खंड विकास अधिकारी दिनेश सिंह का आवास स्थित है। वहीं जेई आरईएस नेहा सिंह का आवास भी इसी परिसर में है।
कार्य दिवसों में अधिकारियों और कर्मचारियों की मौजूदगी बनी रहती है। बावजूद इसके यदि निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं तो निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है।

चंदौली एक्सप्रेस का सीधा सवाल

खंड विकास अधिकारी दिनेश सिंह से सवाल है—
क्या वह अपने निजी आवास की छत अहरौरा की इसी दोयम दर्जे की गिट्टी से ढलवाना पसंद करेंगे?

जेई आरईएस नेहा सिंह से सवाल है— क्या वह अपने घर की छत, सीढ़ी या किसी भी निर्माण कार्य में ऐसी सामग्री का इस्तेमाल कराएंगी?

अगर निजी भवन में ऐसी सामग्री स्वीकार नहीं है तो सरकारी भवन में इसका इस्तेमाल कैसे उचित माना जा सकता है?

अब जरूरत है कि पूरे निर्माण कार्य की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराई जाए। इस्तेमाल हो रही गिट्टी, ईंट, सीमेंट और सरिया की गुणवत्ता की जांच के साथ-साथ प्राकलन और धरातल पर हो रहे कार्य का मिलान कराया जाए, ताकि जनता के पैसे से बन रहा भवन मजबूत और गुणवत्तापूर्ण तैयार हो सके।

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