चंदौली

महिनों पहले होने लगती थी होली की तैयारी अब बदल गई परंपरा

टेसू के रंग से अब केमिकल तक का सफर

चंदौली : जनपद में होली का पर्व कभी प्राकृतिक रंगों, पारंपरिक उत्साह और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक माना जाता था। प्राचीन समय में युवा पीढ़ी और बच्चे महीनों पहले से होली की तैयारियों में जुट जाते थे। गांव के बाहर टेसू (पलाश) के फूल इकट्ठा किए जाते, उन्हें सुखाकर या पानी में भिगोकर प्राकृतिक रंग तैयार किया जाता और उसी से एक-दूसरे को सराबोर किया जाता था।
बच्चे आलू के आधे टुकड़े पर उल्टे अक्षर उकेरकर उसे रंग में डुबोकर दोस्तों की पीठ पर छाप लगाते थे। यह खेल केवल मस्ती नहीं, बल्कि रचनात्मकता और पारंपरिक लोक संस्कृति का हिस्सा हुआ करता था।

टेसू के रंग के पीछे छिपा वैज्ञानिक पक्ष

बदलते समय के साथ बदला होली का स्वरूप

परंपराओं से दूर हो रही नई पीढ़ी

लोगों में जागरूकता की जरूरत

ग्रामीण क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि किसी भी पर्व का स्वरूप बदलने से आने वाली पीढ़ी उसकी मूल भावना और वैज्ञानिक आधार से वंचित रह जाती है। आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों और युवाओं को त्योहारों के पीछे छिपे सांस्कृतिक और वैज्ञानिक तथ्यों से अवगत कराया जाए।
यदि प्राकृतिक रंगों, पारंपरिक रीति-रिवाजों और आपसी सद्भाव की भावना को पुनर्जीवित किया जाए, तो होली फिर से अपने वास्तविक स्वरूप में लौट सकती है—जहां रंग केवल चेहरे पर नहीं, बल्कि रिश्तों में भी घुलते थे।

Chandauli Express

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