टेसू के रंग से अब केमिकल तक का सफर
चंदौली : जनपद में होली का पर्व कभी प्राकृतिक रंगों, पारंपरिक उत्साह और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक माना जाता था। प्राचीन समय में युवा पीढ़ी और बच्चे महीनों पहले से होली की तैयारियों में जुट जाते थे। गांव के बाहर टेसू (पलाश) के फूल इकट्ठा किए जाते, उन्हें सुखाकर या पानी में भिगोकर प्राकृतिक रंग तैयार किया जाता और उसी से एक-दूसरे को सराबोर किया जाता था।
बच्चे आलू के आधे टुकड़े पर उल्टे अक्षर उकेरकर उसे रंग में डुबोकर दोस्तों की पीठ पर छाप लगाते थे। यह खेल केवल मस्ती नहीं, बल्कि रचनात्मकता और पारंपरिक लोक संस्कृति का हिस्सा हुआ करता था।
टेसू के रंग के पीछे छिपा वैज्ञानिक पक्ष
ग्रामीण परंपराओं में पर्व केवल आस्था से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच से भी जुड़े थे। होली के समय मौसम में बदलाव शुरू हो जाता है। सर्दी से गर्मी की ओर संक्रमण के इस दौर में शरीर की प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है। टेसू के फूलों से तैयार रंग में प्राकृतिक औषधीय गुण पाए जाते हैं, जो त्वचा के लिए लाभकारी माने जाते थे।
गर्म वस्त्र उतारकर खुले वातावरण में प्राकृतिक रंगों के साथ होली खेलने से शरीर धीरे-धीरे बदलते मौसम के अनुकूल हो जाता था। इससे सर्दी-जुकाम जैसे संक्रमणों से बचाव में भी मदद मिलती थी।
बदलते समय के साथ बदला होली का स्वरूप
समय परिवर्तन के साथ होली का स्वरूप भी तेजी से बदला है। जहां पहले गांवों में सामूहिक तैयारी और प्राकृतिक रंगों का उपयोग होता था, वहीं अब बाजार में मिलने वाले रेडीमेड और रासायनिक रंगों का प्रचलन बढ़ गया है।
रासायनिक रंगों के उपयोग से त्वचा संबंधी समस्याएं, एलर्जी और आंखों में जलन जैसी शिकायतें बढ़ी हैं। विशेषज्ञों का भी मानना है कि केमिकल मिश्रित रंगों से सावधानी बरतनी चाहिए, विशेषकर बच्चों को।
परंपराओं से दूर हो रही नई पीढ़ी
होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि भाईचारे, आपसी प्रेम और सामाजिक समरसता का अवसर भी रहा है। पहले लोग पुराने मतभेद भुलाकर गले मिलते थे, बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते थे और होली मिलन के जरिए रिश्तों को मजबूत करते थे।
अब त्योहार का स्वरूप बदलकर औपचारिकता और दिखावे तक सीमित होता जा रहा है। सामाजिक जुड़ाव की जगह कई बार प्रतिस्पर्धा और आक्रामकता देखने को मिलती है।
लोगों में जागरूकता की जरूरत
ग्रामीण क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि किसी भी पर्व का स्वरूप बदलने से आने वाली पीढ़ी उसकी मूल भावना और वैज्ञानिक आधार से वंचित रह जाती है। आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों और युवाओं को त्योहारों के पीछे छिपे सांस्कृतिक और वैज्ञानिक तथ्यों से अवगत कराया जाए।
यदि प्राकृतिक रंगों, पारंपरिक रीति-रिवाजों और आपसी सद्भाव की भावना को पुनर्जीवित किया जाए, तो होली फिर से अपने वास्तविक स्वरूप में लौट सकती है—जहां रंग केवल चेहरे पर नहीं, बल्कि रिश्तों में भी घुलते थे।




