रमजान को गनीमत समझ इबादत और खैरात बढ़ाएं, गरीबों की करें मदद :
जो रमजान पाकर भी मगफिरत न करा सके, वह है सबसे बदनसीब
शहाबगंज। रमजान का मुबारक महीना रहमत, बरकत और मगफिरत का महीना है। यह महीना मुसलमानों के लिए अल्लाह तआला की सबसे बड़ी नेमतों में से एक है। इसी पाक महीने में इंसानियत की रहनुमाई के लिए कुरआन मजीद नाजिल किया गया, जो पूरी दुनिया के लिए हिदायत, रहमत, नूर और शिफा का पैगाम लेकर आया।
यह बातें बड़गावां जामा मस्जिद के एमाम मौलाना अजमल हयात ने रमजान की फजीलत पर अपने बयान में कही। उन्होंने कहा कि रमजान का महीना अल्लाह तआला की खास रहमतों और बरकतों से भरा हुआ है। इस महीने की हर घड़ी में इबादत करने वालों के लिए सवाब का बड़ा खजाना छिपा हुआ है। इस महीने में की जाने वाली नफ्ल इबादतों का सवाब फर्ज के बराबर कर दिया जाता है, जबकि फर्ज इबादतों का सवाब सत्तर गुना तक बढ़ा दिया जाता है।
मौलाना अजमल हयात ने कहा कि इस्लाम की बुनियाद पांच अरकान (स्तंभों) पर है, जिनमें रोजा चौथा रुक्न है। रोजा सिर्फ भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह इंसान को सब्र, तकवा और परहेजगारी का सबक देता है। अल्लाह तआला ने फरमाया है कि इंसान का हर अमल उसी के लिए है, लेकिन रोजा मेरे लिए है और इसका बदला मैं खुद दूंगा।
उन्होंने बताया कि हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया है कि वह व्यक्ति बड़ा बदनसीब है, जिसे रमजान का महीना मिले और वह अपनी मगफिरत का सामान न कर सके। रमजान का महीना बंदे को अल्लाह के करीब होने का बेहतरीन मौका देता है। मौलाना अजमल हयात ने हजरत अबू हुरैरा (रज़ि.) से रिवायत का हवाला देते हुए कहा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जब रमजान आता है तो जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं, जहन्नुम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और सरकश शैतानों को जंजीरों में जकड़ दिया जाता है। इस महीने में एक रात ऐसी होती है, जो हजार महीनों से बेहतर है, जिसे शबे-कद्र कहा जाता है।
उन्होंने कहा कि रमजान के आखिरी अशरे में एतकाफ की सुन्नत अदा करनी चाहिए और शबे-कद्र की तलाश में ज्यादा से ज्यादा इबादत करनी चाहिए। साथ ही इस महीने में सदका और खैरात का खास एहतमाम करना चाहिए, ताकि गरीब और जरूरतमंद लोगों के घरों में भी खुशहाली आए और उनके यहां भी चूल्हा जल सके।
मौलाना ने लोगों से अपील की कि रमजान के इस मुबारक महीने को गनीमत समझते हुए ज्यादा से ज्यादा इबादत, तिलावत-ए-कुरआन, दुआ और नेक कामों में वक्त गुजारें, ताकि अल्लाह तआला की रहमत और मगफिरत हासिल हो सके।




