आज अभियुक्त बना वसीम, कभी थाने में खुली आवाजाही और सरकारी गाड़ी चलाने की चर्चा
चन्दौली एक्सप्रेस | इलिया
थाना इलिया पुलिस ने गोवंश तस्करी के खिलाफ एक ही दिन में दो अलग-अलग स्थानों पर कार्रवाई करते हुए तीन गोवंशीय पशु बरामद कर दो लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस इसे बड़ी सफलता बता रही है, लेकिन इलाके में कार्रवाई के तरीके को लेकर चर्चा तेज हो गई है। लोगों का कहना है कि दोनों मामलों में परिस्थितियां मिलती-जुलती होने के बावजूद अलग-अलग धाराएं लगना कई सवाल खड़े कर रहा है।

डेहरी कला मोड़ पर कार्रवाई, बिहार का युवक गोवध अधिनियम में गिरफ्तार
मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने डेहरी कला टर्निंग प्वाइंट के पास घेराबंदी कर टाटा गोल्ड वाहन (UP65 HT 9370) को पकड़ा। तलाशी में दो गोवंशीय पशु बरामद हुए और चालक मुन्ना कुमार गुप्ता निवासी कैमूर (बिहार) को गिरफ्तार कर लिया गया।
पुलिस ने वाहन के साथ 4940 रुपये नगद और एक एंड्रॉयड मोबाइल भी कब्जे में लिया। आरोपी के खिलाफ गोवध निवारण अधिनियम और पशु क्रूरता अधिनियम की गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है।
कब्रिस्तान के पास दूसरी कार्रवाई, लेकिन धाराओं को लेकर चर्चा
इसी दिन करवंदिया कब्रिस्तान के पास पुलिस ने वाहन (UP67 AT 5015) से एक गोवंशीय पशु बरामद करते हुए हटवा निवासी वसीम इद्रिशी को गिरफ्तार किया।
लेकिन इस मामले में पुलिस ने सिर्फ पशु क्रूरता अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया, जिससे इलाके में चर्चा शुरू हो गई।
सूत्रों के अनुसार पशु चिकित्सक ने जांच के दौरान गाय को अनुत्पादक यानी “ठामरा” बताया था। ग्रामीणों पशुपालन व्यवस्था में ऐसी गायों सस्ते दामो में खरीद कर अक्सर वध के उद्देश्य से ले जाए जाने की आशंका रहती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि संदिग्ध परिस्थितियों के बावजूद गोवध निवारण अधिनियम क्यों नहीं लगाया गया।
बताया जा रहा है कि परिवहन के समय आरोपी के पास न तो कोई वैध पशु चिकित्सकीय प्रमाण पत्र था और न ही ग्राम प्रधान या किसी सक्षम अधिकारी की लिखित अनुमति। इसके बावजूद हल्की धाराओं में मुकदमा दर्ज होने को लेकर लोग सवाल उठा रहे हैं।
कुछ लोग इसे पुराने प्रभाव का असर बता रहे हैं, तो कुछ का कहना है कि थाने में लंबे समय से तैनात कुछ कर्मियों के कारण कार्रवाई में नरमी बरती गई।

आज अभियुक्त… कभी थाने का ‘पहचाना चेहरा’?
वसीम को लेकर इलाके में पुराने आरोप भी चर्चा में हैं। ग्रामीणों का दावा है कि पूर्व थानाध्यक्ष अरुण प्रताप सिंह के कार्यकाल में उसकी थाने में आवाजाही आम बात थी।
लोगों का कहना है कि वह न पुलिसकर्मी था और न किसी सरकारी पद पर, फिर भी उसे कई बार थाने के कार्यालय और बैरक तक आते-जाते देखा गया।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि कई मौकों पर उसे थाना इलिया की सरकारी मोबाइल टाटा सूमो गाड़ियों को चलाते हुए भी देखा गया। वायरल फोटो में भी वह यूपी पुलिस की सरकारी गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर बैठा दिखाई दे रहा है।
अब सवाल उठ रहा है कि सरकारी वाहन तक उसकी पहुंच आखिर किस आदेश या जिम्मेदारी के तहत थी।
संरक्षण में चलता रहा नेटवर्क?
ग्रामीणों का कहना है कि अगर उस समय के थाने के सीसीटीवी फुटेज की निष्पक्ष जांच हो जाए तो कई बातें सामने आ सकती हैं। आरोप है कि उसी दौरान क्षेत्र में गोवंश तस्करी ज्यादा सक्रिय थी और कार्रवाई कम नजर आती थी।
कार्रवाई से संदेश या उठते सवाल?
मौजूदा कार्रवाई से जरूर सख्ती का संदेश गया है, लेकिन अलग-अलग मामलों में अलग कानून लागू होने से चर्चा और तेज हो गई है।
इलाके में अब लोग पूछ रहे हैं — “एक ही दिन, एक जैसा अपराध और एक ही थाना… फिर कानून अलग-अलग क्यों?”
और सबसे बड़ा सवाल — “जो कभी सरकारी गाड़ी में बैठकर थाने में आता-जाता था, वह आज सिर्फ पशु क्रूरता का आरोपी कैसे बन गया?”

