व्यवस्थाएं पूरी, लेकिन जनता व अधिकारी दोनों रहे गायब
शहाबगंज (चंदौली)। केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में चलाए जा रहे “विकसित भारत-विकसित उत्तर प्रदेश” अभियान के तहत शहाबगंज ब्लॉक परिसर में सोमवार को विभिन्न विभागों द्वारा जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए स्टॉल लगाए गए। हालांकि कार्यक्रम स्थल की तस्वीरें और मौके की स्थिति अभियान की वास्तविकता पर कई सवाल खड़े कर रही हैं। जहां एक ओर विभागीय स्टॉल आकर्षक ढंग से सजाए गए थे, वहीं दूसरी ओर चौपाल स्थल पर ग्रामीणों की उपस्थिति न के बराबर दिखाई दी।
शासन के निर्देशानुसार ग्राम पंचायतों एवं विकास खंड स्तर पर जन चौपाल, स्वास्थ्य मेले, योग कार्यक्रम तथा जन जागरूकता अभियान आयोजित किए जाने हैं, ताकि आमजन को सरकार की योजनाओं की जानकारी मिल सके और उनकी समस्याओं का समाधान हो सके। लेकिन शहाबगंज ब्लॉक परिसर में आयोजित कार्यक्रम में अपेक्षित भीड़ नहीं जुट सकी।
कार्यक्रम स्थल पर लगी कुर्सियां अधिकांश समय खाली पड़ी रहीं। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बैठने के लिए लगाए गए टेबल-कुर्सी भी खाली नजर आए। मंच के सामने केवल कुछ कर्मचारी और गिने-चुने लोग ही मौजूद दिखाई दिए। इससे यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या कार्यक्रम की जानकारी ग्रामीणों तक समय से पहुंचाई गई थी या फिर आयोजन केवल औपचारिकता तक सीमित रह गया।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि ग्राम पंचायत स्तर पर प्रभावी सूचना दी जाती और लोगों को चौपाल में शामिल होने के लिए प्रेरित किया जाता, तो कार्यक्रम का उद्देश्य सफल हो सकता था। चौपाल का मकसद लोगों को योजनाओं की जानकारी देना, उनकी समस्याएं सुनना और मौके पर समाधान उपलब्ध कराना है, लेकिन कम उपस्थिति के कारण यह उद्देश्य अधूरा नजर आया।
ब्लॉक परिसर में विभिन्न योजनाओं से संबंधित मॉडल, पोस्टर और प्रचार सामग्री प्रदर्शित की गई थी। अधिकारियों ने व्यवस्थाएं तो पूरी कर लीं, लेकिन आम जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने में सफलता नहीं मिल सकी। यही कारण है कि लाखों रुपये खर्च कर चलाए जा रहे जन-जागरूकता अभियानों की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार की मंशा अच्छी है, लेकिन जमीनी स्तर पर जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की उदासीनता के कारण ऐसे कार्यक्रम अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे हैं। लोगों ने मांग की कि भविष्य में ऐसे आयोजनों की वास्तविक मॉनिटरिंग कराई जाए और केवल फोटो खिंचवाने या कागजी कार्रवाई तक कार्यक्रमों को सीमित न रखा जाए।
वहीं, कार्यक्रम में कम उपस्थिति को लेकर जब लोगों के बीच चर्चा हुई तो कई लोगों ने इसे सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार की कमजोर रणनीति का परिणाम बताया। उनका कहना है कि जब तक ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक ऐसे अभियान अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल नहीं हो पाएंगे।




