शहाबगंज में विकास के दावों पर बड़ा सवाल—अधिकारी सुविधाओं में मग्न या ग्रामीण समस्याओं से बेखबर? खुली बैठकों और धरातलीय निरीक्षण की व्यवस्था पर भी उठ रहे सवाल
चन्दौली एक्सप्रेस शहाबगंज।
गांवों के विकास के लिए शासन स्तर से तमाम योजनाएं और बजट दिए जा रहे हैं, लेकिन शहाबगंज विकासखंड की कई ग्राम पंचायतों में आज भी ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। कहीं वर्षों पुराने खड़ंजे बदहाल पड़े हैं तो कहीं घरों तक पहुंचने के लिए सीसी रोड और नाली तक का निर्माण नहीं हो पाया है। बारिश के दिनों में कीचड़ और जलभराव के बीच बच्चों का विद्यालय पहुंचना भी किसी चुनौती से कम नहीं है।
विडंबना देखिए कि जिन अधिकारियों और कर्मचारियों पर गांवों की समस्याओं को मौके पर जाकर देखने और विकास कार्यों की प्राथमिकता तय करने की जिम्मेदारी है, उनके लिए सरकारी सुविधाओं की कोई कमी नहीं है। सरकारी गाड़ी, आने-जाने की सुविधा, कार्यालय में एसी और आवास में भी एसी जैसी सुख-सुविधाओं के बीच उनकी जिंदगी आराम से गुजर रही है। लेकिन सवाल यह है कि जिस आराम और सुविधा का आनंद जिम्मेदार उठा रहे हैं, क्या वैसी ही सुविधा गांव की जनता को भी मिल रही है?
अगर अधिकारी के कार्यालय में एसी की ठंडी हवा पहुंच सकती है, तो गांव की तपती और कीचड़ भरी गलियों की गर्मी उनकी नजरों तक क्यों नहीं पहुंचती?
ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकारी गांवों में नियमित रूप से पहुंचकर वास्तविक समस्याओं का जायजा लेने के बजाय कई बार कागजी प्रक्रिया तक ही सीमित दिखाई देते हैं। खुली बैठक में ग्रामीणों और पंचायत सदस्यों द्वारा समस्याओं को प्रस्ताव के रूप में रखने की व्यवस्था है, ताकि जरूरत के मुताबिक विकास कार्यों को प्राथमिकता दी जा सके। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि जब जिम्मेदार अधिकारी ही गांव में पहुंचकर वास्तविक स्थिति नहीं देखेंगे, तो कागज पर तैयार होने वाले प्रस्तावों में गांव की असली तस्वीर कैसे आएगी?
प्रदर्शन और अनशन के बाद ही क्यों खुलती हैं जिम्मेदारों की आंखें?
क्षेत्र में यह भी देखने को मिल रहा है कि ग्रामीण जब समस्या को लेकर प्रदर्शन, धरना या अनशन करने को मजबूर होते हैं, तब अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का काफिला मौके पर पहुंचता है। निरीक्षण होता है, समस्या दिखाई देती है और फिर उसके समाधान की बात शुरू होती है।
तो क्या अब गांव की टूटी सड़क और बजबजाती नाली तभी दिखाई देगी, जब ग्रामीण हाथों में तख्ती लेकर सड़क पर उतरेंगे?
गांवों में खुली बैठक का उद्देश्य ही यही है कि ग्रामीणों की समस्याएं सामने आएं और विकास की प्राथमिकता तय हो। ऐसे में यह जांच का विषय है कि संबंधित ग्राम पंचायतों में नियमानुसार खुली बैठकें कितनी नियमित और पारदर्शी तरीके से आयोजित हो रही हैं और उनमें उठाए गए प्रस्तावों पर वास्तव में कितना अमल हो रहा है।
कमीशनखोरी के आरोपों ने भी व्यवस्था पर खड़े किए सवाल
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों के बीच विकास कार्यों में कथित कमीशनखोरी को लेकर भी चर्चाएं और आरोप सामने आते रहे हैं। आरोप है कि विकास कार्यों की फाइल स्वीकृति से लेकर भुगतान तक कई स्तरों से गुजरती है और इसमें कथित लेन-देन का खेल चलता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि इनमें सच्चाई है तो यह न केवल गंभीर भ्रष्टाचार का मामला होगा, बल्कि ग्रामीण विकास के हक पर सीधा कुठाराघात भी होगा।
सरकारी धन गांव के विकास के लिए है। उसकी एक-एक पाई का इस्तेमाल उसी काम में होना चाहिए, जिसके लिए वह स्वीकृत की गई है।
सुविधाओं में मग्न व्यवस्था को गांव की हकीकत कब दिखेगी?
सरकारी नौकरी में वेतन और सुविधाएं जनता की सेवा और जिम्मेदारी के बदले मिलती हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ सड़क और नाली का नहीं, जवाबदेही का भी है। सरकारी गाड़ी गांव तक पहुंच सकती है, एसी वाली गाड़ी अधिकारी को गांव से बाहर ले जा सकती है, कार्यालय में एसी चल सकता है, आवास में एसी की ठंडक मिल सकती है—तो फिर उसी अधिकारी की नजर गांव की कीचड़ भरी गली, टूटी सड़क और जलभराव तक क्यों नहीं पहुंचती?
आराम भरी जिंदगी में बैठकर गांव के विकास की तस्वीर शायद फाइलों में अच्छी दिखाई दे, लेकिन धरातल पर उतरते ही विकास की वह तस्वीर कई जगह धुंधली नजर आती है। अब जरूरत है कि जिम्मेदार अधिकारी एसी कमरों से निकलकर गांव की गलियों तक पहुंचें, ग्रामीणों की समस्याएं सुनें, खुली बैठकों की वास्तविकता जांचें और प्राथमिकता के आधार पर विकास कार्य कराएं। क्योंकि गांव की जनता को भाषण नहीं, सड़क चाहिए; कागज पर बनी नाली नहीं, जमीन पर बनी नाली चाहिए और आश्वासन नहीं—धरातल पर विकास चाहिए। ग्रामीणों का सीधा सवाल है—जब सरकारी सुविधाएं गांव की समस्याओं तक नहीं पहुंच पा रहीं, तो आखिर जिम्मेदारों की नजर गांव तक कब पहुंचेगी?




