चौकी से महज 30 मीटर दूर कथित अवैध खनन का आरोप, रोजाना करीब 100 वाहनों की आवाजाही का दावा
मेढ़वा के आलोक सिंह और अमादपुर के मार्कण्डेय सिंह के पुत्र विशाल व छोटू सिंह के बीच मारपीट, पुलिस की निगरानी पर उठे सवाल
चंदौली एक्सप्रेस | धानापुर। नगवा गांव में गंगा किनारे बालू खनन को लेकर चल रही कथित वर्चस्व की जंग गुरुवार को थाना चौराहे तक पहुंच गई। यहां मेढ़वा निवासी आलोक सिंह और अमादपुर निवासी मार्कण्डेय सिंह के पुत्र विशाल सिंह व छोटू सिंह के बीच मारपीट की घटना सामने आई। घटना के बाद गंगा किनारे कई दिनों से चल रहे कथित खनन को लेकर पुलिस की निगरानी और कार्रवाई पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार नगवा गांव में गंगा किनारे पिछले कई दिनों से बड़े पैमाने पर बालू खनन किया जा रहा था। मौके पर करीब तीन जेसीबी और लगभग 50 ट्रैक्टर लगाए जाने की बात कही जा रही है। ग्रामीणों का दावा है कि खनन से निकली बालू को ढोने के लिए प्रतिदिन करीब 100 वाहनों की आवाजाही होती थी। ऐसे में सवाल यह है कि इतनी बड़ी गतिविधि आखिर जिम्मेदारों की नजर से कैसे बची रही?
चौकी से महज 30 मीटर दूर खनन, पुलिस को भनक क्यों नहीं?
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जिस स्थान पर कथित रूप से खनन हो रहा था, वह नगवा चौकी से महज करीब 30 मीटर की दूरी पर बताया जा रहा है। यदि कई दिनों से जेसीबी चल रही थीं, दर्जनों ट्रैक्टर मौके पर लगे थे और रोजाना बड़ी संख्या में वाहन आ-जा रहे थे, तो नगवा चौकी इंचार्ज संजय ओझा को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई?
क्या इसकी सूचना धानापुर थाना प्रभारी तक पहुंची थी? क्या क्षेत्राधिकारी को इसकी जानकारी थी? यदि पुलिस को जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई और यदि जानकारी नहीं थी तो चौकी की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
आखिर किसके सहारे चल रहा था खनन?
स्थानीय लोगों के बीच चर्चा है कि गांव के ही कुछ लोग कथित रूप से खनन गतिविधियों को संचालित करा रहे थे। सोशल मीडिया पर वायरल संदेशों में प्रभावशाली लोगों से नजदीकी का हवाला देकर अपना दबदबा कायम करने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।
यही वजह है कि ग्रामीणों के बीच अब सीधा सवाल उठ रहा है कि आखिर किसके सहारे गंगा किनारे कथित अवैध खनन का यह सिलसिला चल रहा था?
यदि खनन वैध था तो अनुमति किसके नाम थी? कितने क्षेत्र में खनन की अनुमति दी गई थी? क्या मौके पर मौजूद जेसीबी और ट्रैक्टर निर्धारित नियमों के अनुसार काम कर रहे थे? और यदि खनन अवैध था तो इतने दिनों तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
गंगा कटान को लेकर ग्रामीणों में चिंता
ग्रामीणों का कहना है कि गंगा किनारे बड़े पैमाने पर बालू निकाले जाने से नदी कटान का खतरा बढ़ सकता है। गांव के लोग पहले से ही गंगा कटान को लेकर चिंतित हैं। ऐसे में लगातार खनन की गतिविधियों ने उनकी चिंता और बढ़ा दी है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि भविष्य में कटान से गांव प्रभावित होता है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? प्रशासन को किसी बड़े नुकसान का इंतजार करने के बजाय समय रहते मामले की जांच करनी चाहिए।
कारखासी को लेकर पहले भी चर्चा में रहे राजेश यादव
नगवा चौकी पर तैनात राजेश यादव का नाम भी स्थानीय चर्चाओं में सामने आ रहा है। पूर्व में इलिया थाने पर हेड मोहर्रिर के रूप में तैनाती के दौरान शिकायत के बाद एक माह का वेतन काटे जाने की कार्रवाई किए जाने की बात सामने आती रही है। धानापुर स्थानांतरण के बाद नगवा चौकी पर तैनाती के पश्चात भी वह कथित कारखासी और वसूली को लेकर स्थानीय चर्चाओं में रहे हैं।
मारपीट ने बढ़ा दी मामले की गंभीरता
गंगा किनारे कथित खनन के बीच दो पक्षों में हुई मारपीट ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। सवाल उठ रहा है कि आखिर खनन को लेकर ऐसा कौन सा विवाद सामने आया, जिसके बाद मामला थाना चौराहे तक पहुंच गया।
अब पुलिस और प्रशासन के सामने कई अहम सवाल हैं—क्या नगवा में अवैध खनन हो रहा था? क्या रोजाना करीब 100 वाहनों की आवाजाही होती थी? क्या तीन जेसीबी और करीब 50 ट्रैक्टर खनन में लगे थे? खनन की अनुमति किसके नाम थी? चौकी से महज 30 मीटर दूर होने के बावजूद चौकी इंचार्ज संजय ओझा को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई? थाना प्रभारी और क्षेत्राधिकारी तक सूचना पहुंची थी या नहीं? और यदि सूचना थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
मारपीट की घटना के बाद अब ग्रामीण केवल विवाद की जांच नहीं, बल्कि गंगा किनारे कथित खनन, खनन की अनुमति, जेसीबी-ट्रैक्टरों की गतिविधि, वाहनों की आवाजाही और पुलिस की निगरानी व्यवस्था की भी जांच की मांग कर रहे हैं। पूरे मामले में निष्पक्ष जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि नगवा में कई दिनों से चल रही खनन गतिविधि की वास्तविक स्थिति क्या थी और जिम्मेदार स्तर पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई।




