रोहाखी और डूमरी में आंदोलन के बाद अधिकारियों की सक्रियता पर सवाल, बनरसिया में भी उबाल; खुली बैठकों की कागजी रस्म से दब रही ग्रामीणों की आवाज
चन्दौली एक्सप्रेस शहाबगंज। गांव की समस्याएं अचानक पैदा नहीं होतीं, लेकिन शहाबगंज विकासखंड में उनका समाधान कई बार तब शुरू होता दिखाई देता है, जब ग्रामीण धरना और भूख हड़ताल का रास्ता पकड़ लेते हैं। नाली, जलनिकासी, रास्ता, जलभराव और सफाई जैसी मूलभूत समस्याओं को लेकर ग्रामीणों को टेंट लगाकर आंदोलन करना पड़े तो सवाल सिर्फ समस्या का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और निगरानी की पूरी व्यवस्था का खड़ा होता है।
ग्रामीणों का कहना है कि संबंधित ग्राम पंचायतों के अधिकारी और कर्मचारी नियमित रूप से गांव में जाकर समस्याओं की वास्तविक स्थिति देखने के बजाय कई बार पंचायत भवन तक पहुंचकर औपचारिकता पूरी कर वापस लौट आते हैं। ऐसे में गांव की गलियों, बस्तियों और जलभराव वाले स्थानों की वास्तविक तस्वीर जिम्मेदारों तक कैसे पहुंचेगी, यह बड़ा सवाल है।
खुली बैठकें खत्म हुईं तो ग्रामीणों की आवाज भी कमजोर हुई?
पहले ग्राम पंचायतों की खुली बैठकों में ग्रामीण एकत्र होकर अपने गांव और मोहल्ले की समस्याएं सीधे ग्राम प्रधान और पंचायत से जुड़े जिम्मेदारों के सामने रखते थे। सड़क, नाली, जलनिकासी, सफाई और अन्य विकास कार्यों की जरूरत के आधार पर प्राथमिकता तय होती थी और उपलब्ध बजट के अनुसार कार्य कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ती थी।
अब ग्रामीणों का आरोप है कि कई जगह खुली बैठक की प्रक्रिया रजिस्टर और कागजी कार्रवाई तक सीमित होकर रह गई है। यदि बैठक में ग्रामीणों की वास्तविक भागीदारी नहीं होगी और उनकी समस्याएं प्राथमिकता से दर्ज नहीं होंगी तो पंचायत की वास्तविक जरूरतों का पता कैसे चलेगा?
यही वह स्थिति है, जिसके कारण छोटी समस्याएं समय रहते हल होने के बजाय बड़ी होती जाती हैं और अंततः ग्रामीणों को धरना-प्रदर्शन और भूख हड़ताल का रास्ता अपनाना पड़ता है।
रोहाखी में भी धरने के दौरान पहुंचे थे बीडीओ
पूर्व में रोहाखी ग्राम पंचायत में भी ग्रामीणों के धरने के दौरान खंड विकास अधिकारी दिनेश सिंह मौके पर पहुंचे थे। उस दौरान उन्होंने ग्राम पंचायत में नियुक्त नए सचिव लक्ष्मण तिवारी को निर्देश दिया था कि पहले श्रमिक लगाकर गांव में कच्ची नाली की खुदाई कराते हुए पानी निकालने का अस्थायी समाधान किया जाए, इसके बाद आगे की व्यवस्था देखी जाएगी।
मौके पर एक ग्रामीण ने शिकायत करते हुए कहा साहब आगे चलकर भी देखिए कैसे लोग रहते हैं। तो बीडीओ साहब ने कहा अरे चुप रहो, जब यहीं ये स्थिति दिखा रहे हो तो हम नहीं समझ रहे हैं कि कैसे जीवन व्यतीत करते हो?
लेकिन सवाल यह है कि यदि समस्या मौके पर इतनी स्पष्ट थी कि तत्काल अस्थायी समाधान का निर्देश देना पड़ा, तो ग्राम पंचायत के पांच वर्ष के कार्यकाल के दौरान यह स्थिति जिम्मेदारों की नियमित निगरानी में क्यों नहीं आई?
डूमरी में अनशन के बाद नालियों की याद
अब डूमरी ग्राम पंचायत में ग्रामीण कई दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। ग्रामीण जिलाधिकारी के मौके पर पहुंचकर गांव की स्थिति देखने और समस्याओं के समाधान का ठोस आश्वासन देने की मांग पर अड़े हैं। उनका कहना है कि केवल आश्वासन से आंदोलन समाप्त नहीं होगा, जब तक समस्याओं का वास्तविक समाधान जमीन पर दिखाई नहीं देता।
आंदोलन के बीच बीडीओ दिनेश सिंह मौके पर पहुंचे और ग्राम प्रधान संतोष गोंड को विद्यालय जाने वाले रास्ते में पड़ने वाली जाम नालियों तथा दलित बस्ती की जाम नालियों की तत्काल सफाई कराने के निर्देश दिए।
लेकिन सवाल फिर वही है—क्या ये नालियां आंदोलन शुरू होने के बाद जाम हुईं?
हर बरसात में रास्ते पर कीचड़ और जलभराव की स्थिति बनती रही है। विद्यालय परिसर में भी पानी जमा होने की समस्या सामने आती रही है। इन समस्याओं को खबरों के माध्यम से भी उठाया जाता रहा है। फिर आंदोलन से पहले इनका समाधान क्यों नहीं हुआ?
साहब, कार्यालय से निकलकर गांव तक भी आइए
बीडीओ साहब, पंचायत भवन तक पहुंचना और गांव की वास्तविक स्थिति देखना एक बात नहीं है। कभी कार्यालय से निकलकर गांव की गलियों तक भी जाइए। दलित बस्तियों में जाइए। स्कूल तक जाने वाले रास्ते देखिए। बंद नालियों और जलभराव वाले स्थानों को देखिए। यह भी देखिए कि सरकारी धन से कराए गए विकास कार्यों का वास्तविक लाभ ग्रामीणों को मिल रहा है या नहीं।
शहाबगंज विकासखंड की लगभग हर ग्राम पंचायत की दलित बस्तियों में भी मूलभूत समस्याओं को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार अन्य बस्तियों के लोग दौड़-धूप कर अपनी समस्याएं अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाकर काम करा लेते हैं, जबकि दलित बस्तियों की कई समस्याएं लंबे समय तक लंबित रह जाती हैं।
यदि ऐसा है तो यह समीक्षा का विषय है कि विकास कार्यों की प्राथमिकता तय करते समय क्या सभी बस्तियों को समान रूप से महत्व दिया जा रहा है?
पांच साल का कार्यकाल और फिर भी समस्याएं जस की तस?
ग्राम प्रधान का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। इस पूरे कार्यकाल में पंचायत सचिव, एडीओ पंचायत और विकासखंड स्तर के अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था भी चलती रहती है। ऐसे में यदि पांच वर्ष बाद भी गांव में वही नाली, वही जलभराव, वही रास्ता और वही सफाई की समस्या सामने आती है और उसका समाधान धरने के बाद शुरू होता है तो जवाबदेही का सवाल उठना स्वाभाविक है।
सवाल किसी एक व्यक्ति पर नहीं, पूरी व्यवस्था पर है।
क्या ग्राम पंचायतों का निरीक्षण केवल कागजों में हो रहा है? क्या खुली बैठकों में उठने वाली समस्याओं की वास्तव में समीक्षा होती है? क्या पंचायत सचिव नियमित रूप से गांव जाते हैं? क्या एडीओ पंचायत और विकासखंड के अधिकारी पंचायतवार समस्याओं की निगरानी करते हैं?
आंदोलन के समय दिखने वाली तेजी फिर कहां चली जाती है?
धरना शुरू होते ही अधिकारी मौके पर पहुंचते हैं। ग्रामीणों से बातचीत होती है। तत्काल सफाई के निर्देश दिए जाते हैं और आश्वासन देकर आंदोलन समाप्त कराने का प्रयास होता है।
लेकिन सवाल यह है कि यह सक्रियता आंदोलन से पहले क्यों नहीं दिखाई देती?
यदि अधिकारी नियमित निरीक्षण कर रहे हैं तो नाली जाम होने, रास्ता खराब होने, जलभराव होने या बस्ती में सफाई की समस्या पैदा होने के बाद ग्रामीणों को टेंट लगाकर बैठने की जरूरत क्यों पड़ती है?
और यदि अधिकारी गांव की वास्तविक स्थिति से अनजान हैं तो फिर वर्षों तक पंचायत की निगरानी व्यवस्था किस स्तर पर काम करती रही?
धरना स्थल पर पहुंचना जरूरी हो सकता है, लेकिन धरना खत्म होने के बाद समस्या का स्थायी समाधान कराना ही असली परीक्षा है।
बनरसिया भी आंदोलन की राह पर
डूमरी के बाद अब बनरसिया ग्राम पंचायत में भी ग्रामीणों के बीच असंतोष की स्थिति बताई जा रही है। स्थानीय स्तर पर सामने आ रही जानकारी के अनुसार वहां के ग्रामीण भी अपनी समस्याओं को लेकर धरना और भूख हड़ताल की तैयारी में हैं।
यदि बनरसिया में भी ग्रामीणों को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ता है तो यह केवल एक और पंचायत की समस्या नहीं होगी। रोहाखी, डूमरी और अब बनरसिया जैसे मामलों का एक साथ सामने आना विकासखंड स्तर की निगरानी, प्राथमिकता निर्धारण और समस्या समाधान की व्यवस्था पर सवाल खड़ा करेगा।
जरूरत यह है कि बनरसिया में भी आंदोलन का इंतजार करने के बजाय जिम्मेदार अधिकारी पहले ही गांव में पहुंचें, ग्रामीणों से समस्याएं सुनें और वास्तविक स्थिति का स्थलीय निरीक्षण करें।
अब कागज नहीं, गांव की जमीन बोलेगी
ग्राम पंचायत का विकास सिर्फ रजिस्टर में दर्ज कार्यों, बैठकों की कार्यवाही और कागजी रिपोर्ट से तय नहीं होना चाहिए। असली विकास गांव की सड़क, नाली, बस्ती, स्कूल और जलनिकासी व्यवस्था में दिखाई देता है।
अब जरूरत है कि अधिकारी पंचायत भवन तक सीमित रहने के बजाय गांव की गलियों और बस्तियों तक पहुंचें। खुली बैठकों को वास्तविक जनभागीदारी का मंच बनाया जाए, ग्रामीणों की समस्याओं को प्राथमिकता के साथ दर्ज किया जाए और संबंधित कर्मचारियों से समयबद्ध समाधान कराया जाए।
क्योंकि सवाल बहुत सीधा है—
जब गांव की समस्याओं को देखने के लिए अधिकारी मौजूद हैं, तो ग्रामीणों को अपनी समस्या दिखाने के लिए टेंट क्यों लगाना पड़ रहा है?
और सबसे बड़ा सवाल यह है कि
क्या शहाबगंज में विकास की हकीकत फाइलों और रजिस्टरों से तय होगी, या फिर अधिकारी गांव में उतरकर खुद देखेंगे कि जमीन पर वास्तव में कितना विकास हुआ है?




