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सोशल ऑडिट या सिर्फ कागजी रस्म? नामित पर्यवेक्षकों की मौजूदगी पर बड़ा सवाल

10 अक्टूबर से शुरू होकर 13 अक्टूबर को पांच ग्राम पंचायतों में होगी सोशल ऑडिट ग्रामसभा, आदेश में पर्यवेक्षक नामित फिर भी अब तक मौके पर पहुंचने का दावा नहीं—मुनादी से एटीआर तक सवालों की लंबी फेहरिस्त

शहाबगंज। मनरेगा में पारदर्शिता, जवाबदेही और सरकारी धन के सही इस्तेमाल की निगरानी के लिए सोशल ऑडिट की व्यवस्था की गई है। इसी क्रम में जिला स्तर से जारी आदेश में ग्राम पंचायतों में सोशल ऑडिट की पूरी प्रक्रिया को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। आदेश में अधिकारियों को पर्यवेक्षक के रूप में नामित करने से लेकर ग्रामसभा, ग्रामीणों की सहभागिता, अभिलेखों की जांच, फोटोग्राफी, पूर्व की कमियों की समीक्षा, एटीआर और रिपोर्ट अपलोड करने तक की समयसीमा निर्धारित की गई है।
लेकिन शहाबगंज विकासखंड में इस पूरी व्यवस्था के जमीनी अनुपालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि सोशल ऑडिट का कार्यक्रम कागज पर बना है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या आदेश में तय व्यवस्था वास्तव में गांव तक पहुंच रही है?
सबसे बड़ा सवाल नामित पर्यवेक्षकों की मौजूदगी को लेकर है। शहाबगंज विकासखंड में बाल विकास परियोजना अधिकारी, खंड शिक्षा अधिकारी, अधिशासी अभियंता ग्रामीण अभियंत्रण विभाग, अधिशासी अभियंता लघु डाल नहर प्रखंड तथा अधिशासी अभियंता बंधी प्रखंड के अधिकारियों को विभिन्न ग्राम पंचायतों में सोशल ऑडिट के पर्यवेक्षक के रूप में नामित किया गया है।
स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहा है कि अब तक जिन ग्राम पंचायतों में सोशल ऑडिट हुआ, वहां नामित पर्यवेक्षक कितनी बार मौके पर पहुंचे? यदि पर्यवेक्षक मौके पर नहीं पहुंचे तो उनकी जगह सोशल ऑडिट की निगरानी आखिर किसने की? क्या इसके लिए कोई लिखित वैकल्पिक व्यवस्था की गई थी?

10 अक्टूबर से शुरू, 13 अक्टूबर को ग्रामसभा—एक ही दिन पांच गांवों में परीक्षा
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 10 अक्टूबर 2026 सोशल ऑडिट की स्टार्ट डेट है, जबकि 13 अक्टूबर 2026 को सोशल ऑडिट की अंतिम तिथि निर्धारित है। खास बात यह है कि 13 अक्टूबर को ही संबंधित ग्राम पंचायतों में सोशल ऑडिट की ग्रामसभा आयोजित होनी है।
यानी 13 अक्टूबर को शहाबगंज विकासखंड की करीब पांच ग्राम पंचायतों में एक साथ सोशल ऑडिट की प्रक्रिया और ग्रामसभा प्रस्तावित है। यही दिन नामित पर्यवेक्षकों की वास्तविक भूमिका की भी परीक्षा होगा।
कार्यक्रम के अनुसार—
इलिया ग्राम पंचायत में बाल विकास परियोजना अधिकारी, शहाबगंज की ड्यूटी।
घोड़सारी ग्राम पंचायत में खंड शिक्षा अधिकारी, शहाबगंज की ड्यूटी।
हरौड़ा ग्राम पंचायत में अधिशासी अभियंता, ग्रामीण अभियंत्रण विभाग की ड्यूटी।
हाटा ग्राम पंचायत में अधिशासी अभियंता, लघु डाल नहर प्रखंड की ड्यूटी।
ईशापूर कला ग्राम पंचायत में अधिशासी अभियंता, बंधी प्रखंड की ड्यूटी।
अब सवाल सीधा है—13 अक्टूबर को क्या ये सभी नामित पर्यवेक्षक अपने-अपने निर्धारित गांव में मौके पर पहुंचकर सोशल ऑडिट की पूरी प्रक्रिया का पर्यवेक्षण करेंगे?

अब तक पर्यवेक्षक नहीं दिखे तो 13 अक्टूबर को क्या होगा?
स्थानीय स्तर पर दावा किया जा रहा है कि अब तक हुए सोशल ऑडिट के दौरान नामित पर्यवेक्षक मौके पर दिखाई नहीं दिए। इस दावे की आधिकारिक पुष्टि संबंधित उपस्थिति पंजिका, निरीक्षण रिपोर्ट और सोशल ऑडिट की फोटो से की जा सकती है।
यदि अधिकारी वास्तव में मौके पर मौजूद रहे हैं तो विभाग को ग्राम पंचायतवार पर्यवेक्षक की उपस्थिति, निरीक्षण और भूमिका का रिकॉर्ड सामने रखना चाहिए। वहीं यदि वे उपस्थित नहीं रहे तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उनके स्थान पर किसने पर्यवेक्षण किया और क्या उसकी कोई अधिकृत व्यवस्था थी।
क्योंकि पर्यवेक्षक नामित करने का उद्देश्य केवल कागज पर नाम दर्ज करना नहीं, बल्कि सोशल ऑडिट की गुणवत्ता और प्रक्रिया की निगरानी सुनिश्चित करना है।

मुनादी का निर्देश, लेकिन गांव में आवाज कितनी पहुंची?
जिला स्तर से जारी आदेश में सोशल ऑडिट की जानकारी आमजन तक पहुंचाने तथा ग्राम पंचायत स्तर पर निर्धारित कार्यक्रम का प्रचार-प्रसार करने पर जोर दिया गया है। आदेश में सोशल ऑडिट को पारदर्शी बनाने के लिए फोटोग्राफी और ग्रामसभा की प्रक्रिया का भी उल्लेख है।
इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर आरोप है कि सोशल ऑडिट से पहले कई गांवों में मुनादी नहीं कराई जाती और न ही आम ग्रामीणों को पर्याप्त रूप से सूचना देकर पंचायत भवन पर बुलाया जाता है।
सवाल यह है कि जिन मजदूरों के नाम पर मनरेगा में कार्य और मजदूरी का रिकॉर्ड तैयार हुआ, जिनके नाम मस्टर रोल में दर्ज हैं और जिनके गांव में कार्य दिखाया गया है, यदि उन्हीं ग्रामीणों को सोशल ऑडिट की जानकारी नहीं मिलेगी तो सामाजिक सत्यापन किसके सामने होगा?

बंद कमरे की बैठक के आरोप, खुली ग्रामसभा कहां?
स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि कई जगह सोशल ऑडिट की प्रक्रिया व्यापक ग्रामीण सहभागिता के बजाय सीमित लोगों की मौजूदगी में बंद कमरे में पूरी कर ली जाती है।
इन आरोपों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है। लेकिन यदि किसी ग्राम पंचायत में ऐसा पाया जाता है तो यह गंभीर सवाल होगा कि ग्रामसभा में आम मजदूरों, लाभार्थियों और ग्रामीणों को अपनी शिकायत, आपत्ति अथवा कार्यों की वास्तविक स्थिति बताने का अवसर मिला भी या नहीं।
सोशल ऑडिट की मूल भावना ही यह है कि गांव के लोग अपने सामने हुए विकास कार्यों, मजदूरी भुगतान, सामग्री और खर्च से जुड़े रिकॉर्ड पर सवाल कर सकें।

सिर्फ हस्ताक्षर और फोटो से पूरा नहीं होगा सोशल ऑडिट
जारी आदेश में सोशल ऑडिट के दौरान कई स्तरों पर फोटोग्राफी के निर्देश दिए गए हैं—डोर-टू-डोर सत्यापन, कार्यों के सत्यापन और ग्रामसभा बैठक की तस्वीरें लेने की व्यवस्था बताई गई है।
ऐसे में सवाल यह भी है कि फोटो में दिखने वाले लोगों की वास्तविक सहभागिता क्या थी? कितने मजदूर मौजूद थे? कितने आम ग्रामीणों ने अपनी बात रखी? कितनी आपत्तियां दर्ज हुईं?
सिर्फ फोटो और हस्ताक्षर से सोशल ऑडिट की वास्तविक पारदर्शिता साबित नहीं होती। रिकॉर्ड, स्थल सत्यापन और ग्रामीणों की सहभागिता का मिलान भी जरूरी है।

पिछली कमियों की एटीआर आखिर कहां तक पहुंची?
जिला स्तर से जारी आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि विकासखंड में होने वाली सोशल ऑडिट ग्रामसभा में पूर्व वर्षों में पाई गई कमियों की एटीआर की समीक्षा की जाएगी।

शहाबगंज की कितनी ग्राम पंचायतों में पूर्व सोशल ऑडिट की कमियों की समीक्षा हुई?
कितनी कमियों पर कार्रवाई हुई?
कितनी एटीआर तैयार हुई?
कितने मामलों में धनराशि की वसूली हुई?
कितने मामलों में जिम्मेदारी तय हुई?
और कितने मामले आज भी लंबित हैं?
यदि समीक्षा हुई है तो ग्राम पंचायतवार एटीआर की स्थिति सामने रखी जानी चाहिए।

ग्राम चौपाल के साथ सोशल ऑडिट का निर्देश भी सवालों में
जारी आदेश में सोशल ऑडिट ग्रामसभा की बैठक को ‘ग्राम चौपाल’ के साथ आयोजित करने का प्रयास करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
लेकिन स्थानीय स्तर पर सवाल है कि अब तक शहाबगंज की कितनी ग्राम पंचायतों में सोशल ऑडिट वास्तव में ग्राम चौपाल के साथ आयोजित हुआ?
13 अक्टूबर को होने वाली ग्रामसभाओं में भी यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या ग्राम चौपाल के साथ सोशल ऑडिट आयोजित किया जाता है या यह निर्देश भी कागजों तक सीमित रह जाता है।

आदेश में समयसीमा तक तय, फिर अनुपालन की निगरानी कौन करेगा?
जारी आदेश में सोशल ऑडिट के बाद भी पूरी प्रक्रिया की समयसीमा निर्धारित की गई है। सोशल ऑडिट पूरी होने के बाद रिपोर्ट को 07 कार्य दिवस के भीतर जिला विकास अधिकारी कार्यालय में उपलब्ध कराने तथा निर्धारित प्रारूप में रिपोर्ट को आगे अपलोड कराने की व्यवस्था बताई गई है। ग्रामसभा की बैठक के बाद रिपोर्ट को निर्धारित समय के भीतर भारत सरकार की वेबसाइट पर अपलोड कराने और एटीआर को भी निर्धारित समयसीमा में अपलोड करने का निर्देश है।
यानी आदेश में शुरुआत से लेकर रिपोर्ट और एटीआर तक पूरी प्रक्रिया के लिए जिम्मेदारी और समयसीमा तय है।
ऐसे में सवाल यह है कि यदि शुरुआती स्तर पर ही नामित पर्यवेक्षक मौके पर मौजूद नहीं रहते, मुनादी नहीं होती या ग्रामीणों की पर्याप्त सहभागिता नहीं होती तो बाद में तैयार होने वाली सोशल ऑडिट रिपोर्ट की विश्वसनीयता की जांच कौन करेगा?

13 अक्टूबर को पांच गांवों में होगी असली अग्निपरीक्षा
अब 13 अक्टूबर को इलिया, घोड़सारी, हरौड़ा, ठाटा और सापूर कला में होने वाली सोशल ऑडिट ग्रामसभाएं इस व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा बन सकती हैं।
क्या नामित पर्यवेक्षक अपने निर्धारित गांव में पहुंचेंगे?
क्या मुनादी और सूचना का रिकॉर्ड मिलेगा?
क्या आम ग्रामीण और मनरेगा मजदूर ग्रामसभा में मौजूद होंगे?
क्या पिछले सोशल ऑडिट की कमियों और एटीआर पर चर्चा होगी?
क्या ग्राम चौपाल के साथ बैठक होगी?
क्या सोशल ऑडिट टीम के साथ पर्यवेक्षक मौके पर रहेंगे?
और क्या पूरी प्रक्रिया की फोटो व कार्यवाही वास्तविक स्थिति को दर्शाएगी?

चंदौली एक्सप्रेस का सवाल
जिला स्तर से जब पर्यवेक्षकों को बाकायदा नामित किया गया है, ग्राम पंचायतवार ड्यूटी तय है, सोशल ऑडिट की स्टार्ट और अंतिम डेट निर्धारित है तथा ग्रामसभा की तिथि भी तय है, तो फिर पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी सिर्फ कागज पर क्यों रहे?
यदि नामित अधिकारी 13 अक्टूबर को अपने-अपने निर्धारित ग्राम पंचायत में मौजूद रहकर सोशल ऑडिट की निगरानी करते हैं तो उपस्थिति पंजिका, फोटो, निरीक्षण रिपोर्ट और ग्रामसभा की कार्यवाही स्वयं इसका प्रमाण बनेगी।
लेकिन यदि नामित पर्यवेक्षक मौके पर नहीं पहुंचते हैं तो सवाल और बड़ा होगा कि जिला स्तर से जारी निर्देश के बावजूद पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी किसने निभाई और सोशल ऑडिट की प्रक्रिया की वास्तविक निगरानी आखिर किसके भरोसे रही?
अब 13 अक्टूबर को होने वाली पांच ग्राम पंचायतों की सोशल ऑडिट ग्रामसभाओं पर निगाह रहेगी—क्योंकि उस दिन कागज पर दर्ज आदेश और गांव की जमीन पर उसकी हकीकत के बीच का अंतर खुद सामने आ सकता है।

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