सफाईकर्मियों में आक्रोश, अभद्रता और कथित वसूली के आरोपों से घिरे अधिकारी; 2024 के हैंडपंप प्रकरण की पुरानी शिकायत भी सवालों में
चन्दौली एक्सप्रेस शहाबगंज (चंदौली)। विकासखंड शहाबगंज में सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) अरविंद कुमार सिंह की करीब छह वर्षों से तैनाती को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। वर्तमान में नाम न छापने की शर्त पर सफाईकर्मियों ने बताया कि एडीओ पंचायत अरविंद सिंह द्वारा अभद्र व्यवहार, गाली-गलौज और कथित रूप से धन की मांग किए जाने से हम लोग त्रस्त है। और कर्मचारियों में आक्रोश की स्थिति बताई जा रही है। खास बात यह है कि अधिकारी से जुड़ा यह पहला विवाद नहीं है। वर्ष 2024 में भी ग्राम पंचायतों में हैंडपंप रिबोर के बाद निकली खराब पाइपों को लेकर शिकायत सामने आई थी, जिसकी अखबारी खबर और तस्वीर अब भी मामले से जुड़े पुराने दस्तावेज के रूप में मौजूद है।
वर्ष 2024 में प्रकाशित खबर के अनुसार फतेहपुर खुर्द निवासी रामप्रवेश यादव ने अधिकारियों को शिकायत देकर आरोप लगाया था कि ग्राम पंचायतों में खराब हैंडपंपों के रिबोर के दौरान निकली पुरानी पाइपों को नियमानुसार नीलामी अथवा निस्तारण की प्रक्रिया के बजाय वाहन से बाहर ले जाया गया। शिकायतकर्ता ने मामले की जांच की मांग की थी और पाइप लदे वाहन की तस्वीर भी उपलब्ध कराए जाने की बात खबर में दर्ज थी।
पुराना मामला होने के बावजूद इसकी जांच और कार्रवाई की स्थिति आज भी सवाल खड़े करती है। आखिर शिकायत के बाद क्या जांच हुई? यदि जांच हुई तो उसका परिणाम क्या रहा? सरकारी रिकॉर्ड में उन पाइपों का हिसाब क्या दर्ज है और उनके निस्तारण की प्रक्रिया क्या रही—इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग के अभिलेखों में होना चाहिए।
हैंडपंप रिबोर के बाद निकलने वाली सामग्री को लेकर विभागीय दिशा-निर्देश लागू होते हैं। ऐसे में जांच का केंद्र यह होना चाहिए कि संबंधित ग्राम पंचायतों में कितने हैंडपंप रिबोर हुए, कितनी सामग्री निकली, उसका अभिलेख कहां दर्ज हुआ और उसका निस्तारण किस प्रक्रिया के तहत किया गया। सरकारी सामग्री के मामले में हिसाब-किताब और निस्तारण की प्रक्रिया जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका अभिलेखीय प्रमाण भी है।
इधर सफाईकर्मियों की ओर से लगाए गए वर्तमान आरोपों ने मामले को और तूल दे दिया है। कर्मचारियों का आरोप है कि उनके साथ अधिकारी का व्यवहार अमर्यादित रहता है तथा कथित रूप से धन की मांग को लेकर दबाव बनाया जाता है। यदि कर्मचारियों की शिकायतें लिखित रूप में उच्चाधिकारियों तक पहुंची हैं तो मामला विभागीय जांच की मांग करता है। कर्मचारियों से जुड़े आरोपों की जांच में शिकायत, बयान, आदेश और संबंधित रिकॉर्ड को आधार बनाकर जिम्मेदारी तय की जा सकती है।
वहीं करीब छह वर्षों से एक ही विकासखंड में तैनाती भी चर्चा का बड़ा विषय बन गई है। इतने लंबे समय से एक ही स्थान पर तैनाती के बीच अधिकारी के खिलाफ बार-बार शिकायतें सामने आने से कर्मचारियों और ग्रामीणों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर शिकायतों के बावजूद विभागीय स्तर पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई दी?
मामले में अब जिला प्रशासन और पंचायती राज विभाग से पुराने हैंडपंप प्रकरण के अभिलेख, वर्तमान शिकायतों तथा अधिकारी की लंबे समय से चली आ रही तैनाती की गंभीरता से समीक्षा किए जाने की मांग उठ रही है। शिकायतों की जांच के साथ यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि पूर्व में सामने आए मामलों में विभागीय स्तर पर क्या निर्णय लिए गए थे।
एक अधिकारी के खिलाफ शिकायतें सामने आना अलग बात है, लेकिन शिकायतों के बाद भी कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट न होना प्रशासनिक पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। शहाबगंज में अब निगाह इस बात पर है कि संबंधित विभाग इन शिकायतों को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या अभिलेखों की जांच के आधार पर जिम्मेदारी तय होती है।




