चकिया

एक ही वाउचर, वही रकम… फिर भुगतान कितनी बार?

शहाबगंज में पंचायत भुगतानों पर उठे सवाल, हैंडपंप रिबोर से सप्लायर फर्म तक अभिलेख और धरातल के सत्यापन की जरूरत

चन्दौली एक्सप्रेस शहाबगंज। ग्राम पंचायतों में सरकारी धन खर्च करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया है। किसी भी विकास कार्य को पहले ग्राम पंचायत विकास योजना की कार्ययोजना में शामिल किया जाता है। इसके बाद ग्राम सभा का अनुमोदन, प्रस्ताव, आवश्यक स्वीकृति, प्राक्कलन और निर्धारित तकनीकी प्रक्रिया पूरी होने के बाद कार्य कराया जाता है। कार्य के वास्तविक निष्पादन और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर ही भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़नी चाहिए। ऐसे में प्रत्येक भुगतान का संबंधित कार्य से स्पष्ट और सत्यापन योग्य जुड़ाव होना जरूरी है।
शहाबगंज विकासखंड की कुछ ग्राम पंचायतों में ऑनलाइन दर्ज भुगतानों और अपलोड अभिलेखों की पड़ताल में ऐसे बिंदु सामने आए हैं, जिनका अभिलेखीय और स्थलीय सत्यापन आवश्यक प्रतीत होता है। इनमें हैंडपंप रिबोर और मरम्मत के नाम पर भुगतान, एक जैसे वाउचर तथा सामग्री आपूर्ति करने वाली फर्मों के पते से जुड़े सवाल शामिल हैं।

रिबोर के नाम पर भुगतान, लेकिन किस हैंडपंप का?
कुछ भुगतान विवरणों में हैंडपंप रिबोर के नाम पर सामग्री भुगतान दर्ज दिखाई देता है। ऐसे में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि भुगतान किस हैंडपंप और किस स्थान पर कराए गए कार्य के लिए किया गया। संबंधित कार्य कार्ययोजना में दर्ज था या नहीं, उसका प्रस्ताव और स्वीकृति हुई या नहीं, प्राक्कलन तैयार हुआ या नहीं और मौके पर वास्तव में कार्य हुआ या नहीं—इन सभी बिंदुओं का सत्यापन आवश्यक है।
इसी तरह हैंडपंप मरम्मत के नाम पर हुए हजारों रुपये के भुगतान में भी संबंधित हैंडपंप की पहचान, स्थान और कराए गए कार्य का विवरण अभिलेखों से मिलान किया जाना चाहिए।

एक ही वाउचर और समान राशि ने बढ़ाया सवाल
कुछ मामलों में एक ही वाउचर संख्या और समान राशि वाले बिल-वाउचर को एक से अधिक भुगतानों में अपलोड किए जाने जैसा विवरण सामने आया है। यदि जांच में भी वाउचर संख्या और राशि समान पाई जाती है तो यह स्पष्ट करना जरूरी होगा कि एक ही दस्तावेज अलग-अलग भुगतानों में किस आधार पर दर्ज हुआ।
हालांकि केवल ऑनलाइन विवरण के आधार पर इसे अनियमित भुगतान मान लेना उचित नहीं होगा। मूल वाउचर, बिल, भुगतान स्वीकृति और बैंक भुगतान का मिलान होने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।
वहीं कुछ भुगतान विवरणों में प्राप्तकर्ता का स्पष्ट नाम न होकर सामान्य अथवा अस्पष्ट विवरण दिखाई देने की स्थिति भी सत्यापन का विषय है। सरकारी धन के भुगतान में यह स्पष्ट होना चाहिए कि भुगतान किस व्यक्ति, संस्था अथवा फर्म को और किस कार्य या सामग्री के एवज में किया गया।

बिल पर जीएसटी पंजीकरण, मौके पर नहीं मिले प्रतिष्ठान
सामग्री आपूर्ति से जुड़े कुछ बिलों पर फर्म का नाम, पता और वस्तु एवं सेवा कर पंजीकरण संख्या दर्ज है। वहीं पड़ताल के दौरान ऐसे कई जीएसटी पंजीकरण सामने आने की बात कही जा रही है, जो शहाबगंज विकासखंड कार्यालय से जुड़ी ग्राम पंचायतों में सामग्री आपूर्ति के बिलों में दर्ज हैं, लेकिन संबंधित पते पर मौके पर कोई दुकान अथवा व्यवसायिक प्रतिष्ठान संचालित होता नहीं पाया गया। ऐसे में संबंधित फर्मों की वास्तविक व्यवसायिक गतिविधि और ग्राम पंचायतों को सामग्री आपूर्ति के लिए उनकी पात्रता का सत्यापन आवश्यक हो जाता है। हालांकि, केवल किसी पते पर दुकान नहीं मिलने के आधार पर किसी फर्म को फर्जी या अवैध कहना उचित नहीं होगा। वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था में फर्म का मुख्य व्यवसाय स्थल और अतिरिक्त व्यवसाय स्थल दर्ज हो सकता है। इसलिए यह जांचना जरूरी होगा कि संबंधित फर्म के पंजीकरण में कौन सा व्यवसाय स्थल दर्ज है, पंजीकरण सक्रिय है या नहीं और ग्राम पंचायत ने उसे सामग्री आपूर्तिकर्ता के रूप में किस प्रक्रिया एवं सत्यापन के आधार पर स्वीकार किया। यदि फर्म किसी अन्य वैध घोषित व्यवसाय स्थल से कारोबार कर रही है और सामग्री वास्तव में पंचायत को उपलब्ध कराई गई है तो केवल एक पते पर प्रतिष्ठान नहीं मिलने से भुगतान स्वतः अवैध नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि जांच में पता गलत अथवा अस्तित्वहीन पाया जाता है, वास्तविक व्यवसायिक गतिविधि नहीं मिलती और सामग्री आपूर्ति का पर्याप्त प्रमाण भी उपलब्ध नहीं होता, तो मामला विस्तृत जांच का विषय बन सकता है। ऐसे में सवाल यह भी है कि यदि संबंधित फर्मों के प्रतिष्ठान धरातल पर मौजूद नहीं हैं तो ग्राम पंचायतों को सामग्री की आपूर्ति आखिर कहां से और किस माध्यम से की गई, तथा उन्हें सप्लायर के रूप में स्वीकार करने से पहले उनका सत्यापन किस स्तर पर किया गया?

सामग्री आई तो आखिर कहां से?
सवाल यह भी है कि जिस फर्म के नाम पर पंचायत में बिल दर्ज है, उसके बताए पते पर प्रतिष्ठान नहीं मिलता तो सामग्री का वास्तविक स्रोत क्या था और वह पंचायत तक कैसे पहुंची?
इसके लिए सामग्री खरीद, आपूर्ति, परिवहन, पंचायत में प्राप्ति और भंडार पंजिका में दर्ज विवरण का मिलान किया जाना चाहिए। इसी तरह रिबोर और मरम्मत के नाम पर हुए भुगतानों का मौके पर सत्यापन भी जरूरी है।

अभिलेखों के मिलान से साफ होगी तस्वीर
मामले में कार्ययोजना, ग्राम सभा प्रस्ताव, स्वीकृति, प्राक्कलन, तकनीकी अनुमोदन, कार्यादेश, बिल-वाउचर, वाउचर संख्या, भुगतान राशि, भुगतान प्राप्तकर्ता, वस्तु एवं सेवा कर पंजीकरण, मुख्य एवं अतिरिक्त व्यवसाय स्थल, सामग्री प्राप्ति, भंडार पंजिका और मौके पर हुए कार्य का आपस में मिलान कराया जाए तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
यदि सभी भुगतान निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार हुए हैं तो अभिलेख और स्थलीय सत्यापन इसकी पुष्टि कर देंगे। वहीं यदि दस्तावेजों और धरातल की स्थिति में अंतर मिलता है तो सक्षम स्तर से जिम्मेदारी निर्धारित कर नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।
फिलहाल सवाल यही है—हैंडपंप रिबोर हुआ तो कहां, मरम्मत हुई तो किसका, एक ही वाउचर दो जगह है तो क्यों और जिस फर्म के नाम पर सामग्री खरीदी गई, उसका वास्तविक व्यवसाय स्थल व आपूर्ति का स्रोत क्या है? इन सवालों का जवाब निष्पक्ष जांच और अभिलेखों के मिलान से ही सामने आएगा।

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