चंदौली

तीन दिन घनघोर बारिश, फिर भी वीबी-जी राम जी में जारी रहा काम!

चंदौली में 47.8 मिलीमीटर बारिश, जगह-जगह जलभराव और कीचड़ के बीच तीन दिनों में 16,364 मानव दिवस दर्ज; करीब 49 लाख रुपये की मजदूरी का सवाल, नाली खुदाई से रोकथाम दीवार तक के कार्यों पर उठे सवाल

चंदौली एक्सप्रेस | चंदौली। 25, 26 और 27 सितंबर को जिले में लगातार तीन दिनों तक बारिश का दौर रहा। दिन में बारिश और रात में भी बारिश के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में जगह-जगह जलभराव और कीचड़ की स्थिति बनी रही। चंदौली में तीन दिनों में 47.8 मिलीमीटर बारिश दर्ज होने तथा जगह-जगह जलभराव की स्थिति सामने आने की खबरें भी प्रकाशित हुईं। प्रदेश स्तर पर भी 25 से 27 सितंबर के बीच भारी बारिश के कारण कई जिलों में जलभराव की स्थिति रही।
लेकिन इसी दौरान वीबी-जी राम जी के सरकारी ऑनलाइन पोर्टल पर जिले के सभी विकासखंडों में मजदूरों की उपस्थिति और अलग-अलग कार्य लगातार दर्ज होते रहे। ऑनलाइन अभिलेखों में नाली खुदाई, चकरोड पर मिट्टी भराई, पटरी पर मिट्टी भराई, मेड़बंदी, बंधी निर्माण और रोकथाम दीवार जैसे कार्य दिखाई दे रहे हैं।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब खेतों, नालों और कार्यस्थलों पर पानी भरा था और मिट्टी पूरी तरह गीली हो चुकी थी, तब आखिर नाली खुदाई और मिट्टी भराई जैसे कार्य कैसे कराए गए?

25 सितंबर को 3,022, 26 को 5,710 और 27 सितंबर को 7,632 मानव दिवस
वीबी-जी राम जी के पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 25 सितंबर को जिले में 3,022 मानव दिवस, 26 सितंबर को 5,710 मानव दिवस और 27 सितंबर को 7,632 मानव दिवस दर्ज हुए। इस तरह तीन दिनों में कुल 16,364 मानव दिवस दर्ज किए गए।
25 सितंबर को बरहनी में 68, चहनिया 397, चकिया 145, चंदौली 16, धानापुर 800, नौगढ़ 970, नियामताबाद 26, शहाबगंज 595 और सकलडीहा में 5 मानव दिवस दर्ज हुए।
26 सितंबर को बरहनी में 288, चहनिया 359, चकिया 524, चंदौली 22, धानापुर 1,532, नौगढ़ 2,049, नियामताबाद 27, शहाबगंज 886 और सकलडीहा में 23 मानव दिवस दर्ज हुए।
27 सितंबर को बरहनी में 512, चहनिया 406, चकिया 593, चंदौली 32, धानापुर 1,556, नौगढ़ 2,791, नियामताबाद 25, शहाबगंज 1,272 और सकलडीहा में 445 मानव दिवस दर्ज हुए।
16,364 मानव दिवस यानी करीब 49 लाख रुपये की मजदूरी का सवाल
पोर्टल पर दर्ज 16,364 मानव दिवस को उत्तर प्रदेश में लागू ₹300 प्रतिदिन की मजदूरी दर के हिसाब से देखें तो इन मानव दिवसों की मजदूरी करीब 49 लाख 9 हजार 200 रुपये बैठती है।
हालांकि यह राशि पोर्टल पर दर्ज मानव दिवस के आधार पर निकाला गया अनुमानित मजदूरी मूल्य है। वास्तविक भुगतान संबंधित अभिलेखों, स्वीकृत कार्य, उपस्थिति और भुगतान प्रक्रिया के आधार पर निर्धारित होगा।
यही वजह है कि सवाल केवल ऑनलाइन उपस्थिति का नहीं, बल्कि करीब 49 लाख रुपये की संभावित मजदूरी से जुड़े इन मानव दिवसों की वास्तविकता का भी है। यदि इन मानव दिवसों के आधार पर भुगतान हो चुका है अथवा भुगतान की प्रक्रिया चल रही है तो क्या भुगतान से पहले संबंधित कार्यों का मौके पर सत्यापन किया गया?

बारिश में आखिर कौन सा ‘यंत्र’ कर रहा था मिट्टी की खुदाई और भराई?
लगातार बारिश के दौरान जब आम लोग बारिश से बचने के लिए घरों में बैठे थे, खेतों में पानी था और ग्रामीण रास्ते कीचड़ से लथपथ थे, तब ऑनलाइन पोर्टल पर मिट्टी से जुड़े कार्य दर्ज होते रहे।
सवाल है कि नाली खुदाई कैसे हुई? चकरोड और पटरी पर मिट्टी कैसे डाली गई? मेड़बंदी कैसे हुई?
यदि वास्तव में मजदूर बारिश के दौरान इन कार्यों में लगे थे तो उस समय कार्यस्थल की स्थिति क्या थी? क्या राष्ट्रीय मोबाइल निगरानी प्रणाली पर दर्ज तस्वीरों में मजदूर वास्तविक रूप से काम करते दिखाई दे रहे हैं? क्या तस्वीर में उसी समय की बारिश और कार्यस्थल की वास्तविक स्थिति नजर आ रही है?

आसमान से बरस रहा था पानी, फिर रोकथाम दीवार का मसाला कैसे तैयार हुआ?
मामला केवल मिट्टी के कार्यों तक सीमित नहीं है। ऑनलाइन अभिलेखों में रोकथाम दीवार जैसे निर्माण कार्य भी दर्ज दिखाई दे रहे हैं।
जब लगातार बारिश हो रही थी तो निर्माण स्थल पर सीमेंट-बालू का मसाला कैसे तैयार हुआ? बारिश के बीच रोकथाम दीवार की जुड़ाई कैसे हुई? निर्माण सामग्री को बारिश से बचाने के लिए क्या व्यवस्था थी?
यदि वास्तव में बारिश के दौरान निर्माण हुआ तो उसकी तस्वीरें, समय और स्थान का विवरण तथा माप पुस्तिका इसकी वास्तविकता स्पष्ट कर सकती है।

सिर्फ मजदूरों की उपस्थिति काफी नहीं, कार्य की तकनीकी जांच भी जरूरी
मामला केवल ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज होने तक सीमित नहीं है। तकनीकी रूप से यह भी देखा जाना जरूरी है कि दर्ज कार्य वास्तव में निर्धारित मात्रा और गुणवत्ता में हुआ या नहीं।
नाली खुदाई में उसकी लंबाई, चौड़ाई और गहराई कितनी थी? चकरोड और पटरी पर मिट्टी भराई में कितनी मिट्टी डाली गई, मिट्टी कहां से लाई गई और उसे किस तरह फैलाया गया? मेड़बंदी में मेड़ का आकार और मजबूती कैसे सुनिश्चित की गई? वहीं रोकथाम दीवार में नींव, आधार, मसाले की गुणवत्ता और जुड़ाई की स्थिति क्या रही?
खास तौर पर लगातार बारिश में गीली और पानी से संतृप्त मिट्टी पर किए गए कार्य की तकनीकी गुणवत्ता का सवाल भी महत्वपूर्ण है। इसलिए माप पुस्तिका में दर्ज मात्रा और मौके पर मौजूद वास्तविक कार्य का मिलान कराया जाना जरूरी है।

मस्टर रोल खत्म, माप और भुगतान भी हो गया हो तो मौके पर कौन पहुंचा?
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण सवाल मस्टर रोल की अवधि समाप्त होने के बाद की प्रक्रिया को लेकर है। 25 से 27 सितंबर को जारी कई मस्टर रोल की अवधि अब समाप्त हो चुकी होगी। कुछ कार्य पूरे हो चुके होंगे और संभव है कि उनकी माप कराकर भुगतान भी करा दिया गया हो।
लेकिन सवाल यह है कि क्या माप से पहले संबंधित तकनीकी सहायक, अवर अभियंता, खंड विकास अधिकारी या अन्य जिम्मेदार अधिकारी मौके पर निरीक्षण के लिए पहुंचे थे?
क्या किसी अधिकारी ने जाकर यह देखा कि भारी बारिश के दौरान वास्तव में कार्य हुआ था या केवल मोबाइल पर राष्ट्रीय मोबाइल निगरानी प्रणाली के माध्यम से ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज हुई?
यदि कार्य की माप और भुगतान हो चुका है तो माप पुस्तिका में दर्ज मात्रा और मौके पर मौजूद वास्तविक कार्य का मिलान कराया जाना चाहिए। साथ ही निरीक्षण की तारीख और निरीक्षण रिपोर्ट भी सामने आनी चाहिए।

उपस्थिति से भुगतान तक पूरी कड़ी की जांच जरूरी
इस मामले में जांच केवल यह देखने तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि मजदूरों की उपस्थिति ऑनलाइन दर्ज हुई या नहीं। बल्कि पूरी प्रक्रिया की कड़ी देखी जानी चाहिए—
ऑनलाइन उपस्थिति → समय व स्थान सहित तस्वीर → वास्तविक कार्यस्थल → माप पुस्तिका → तकनीकी सत्यापन → कार्य पूर्णता → भुगतान।
यदि इन सभी अभिलेखों का आपस में मिलान किया जाए तो बारिश के दौरान दर्ज कार्यों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
क्या राष्ट्रीय मोबाइल निगरानी प्रणाली में दर्ज तस्वीरों में वही मजदूर हैं जिनकी उपस्थिति दर्ज की गई? क्या तस्वीर उसी कार्यस्थल की है? क्या तस्वीर के समय वास्तव में कार्य चल रहा था? क्या बाद में उसी कार्य की माप हुई? माप पुस्तिका में दर्ज मात्रा मौके पर मौजूद है? और यदि भुगतान हो चुका है तो भुगतान से पहले किस अधिकारी ने सत्यापन किया?

जिला प्रशासन की निगरानी पर भी सवाल
तीन दिनों में 16,364 मानव दिवस दर्ज होना अपने आप में किसी अनियमितता का अंतिम प्रमाण नहीं है, लेकिन लगातार बारिश, जलभराव और कीचड़ के बीच इतने बड़े पैमाने पर मानव दिवस और विभिन्न कार्यों का दर्ज होना स्थलीय जांच का मजबूत आधार जरूर बनता है।
खासकर जिन विकासखंडों में इन दिनों बड़ी संख्या में मानव दिवस दर्ज हुए हैं, वहां के कार्यों का स्थलीय सत्यापन कराया जाना जरूरी है।
क्या संबंधित विकासखंड स्तर के अधिकारियों ने बारिश के दौरान चल रहे कार्यों का निरीक्षण किया था? क्या जिला स्तर से किसी अधिकारी ने मौके पर पहुंचकर स्थिति देखी? यदि निरीक्षण हुआ था तो उसकी तारीख, निरीक्षण रिपोर्ट और उसमें दर्ज कार्य की स्थिति क्या थी?

अब तस्वीर, माप पुस्तिका और मौके की जांच से सामने आएगी सच्चाई
वीबी-जी राम जी के पोर्टल पर दर्ज आंकड़े अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं हैं। लेकिन लगातार बारिश, जलभराव और कीचड़ के बीच दर्ज हुए हजारों मानव दिवस तथा मिट्टी और निर्माण कार्यों को देखते हुए निष्पक्ष स्थलीय सत्यापन जरूरी है।
25, 26 और 27 सितंबर के सभी संबंधित कार्यों की राष्ट्रीय मोबाइल निगरानी प्रणाली में दर्ज तस्वीरें, समय और स्थान, मस्टर रोल, माप पुस्तिका, निरीक्षण अभिलेख और भुगतान विवरण का मिलान कराया जाए।
आखिर जब आसमान से लगातार पानी बरस रहा था, खेतों में पानी भरा था और रास्ते कीचड़ से लथपथ थे, तब नाली खुदाई, मिट्टी भराई, मेड़बंदी और रोकथाम दीवार का निर्माण किस तरह हुआ?
क्या बारिश के बीच वास्तव में मजदूरों ने काम किया या फिर कार्यस्थल पर काम की जगह केवल मोबाइल पर ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज होती रही?
अब इन सवालों का जवाब किसी दावे से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मोबाइल निगरानी प्रणाली की तस्वीरों, माप पुस्तिका, तकनीकी निरीक्षण और मौके के निष्पक्ष सत्यापन से सामने आना चाहिए।

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