जिला क्रीड़ा अधिकारी की ड्यूटी पर सवाल, पहले से जानकारी थी तो नामित क्यों किया? ग्रामीणों को बार-बार बुलाकर लौटाने से बढ़ी परेशानी
चन्दौली एक्सप्रेस इलिया । शहाबगंज विकासखंड के मनकपड़ा गांव में सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान के चयन का मामला लगातार लंबा खिंचता जा रहा है। मंगलवार को पांचवीं बार चयन प्रक्रिया स्थगित होने से ग्रामीणों को निराश होकर लौटना पड़ा। जिला स्तरीय अधिकारी के नहीं पहुंचने के कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब जिला क्रीड़ा अधिकारी की ड्यूटी पहले से किसी अन्य स्थान पर निर्धारित थी, तो उन्हें कोटे की दुकान के चयन के लिए किस आधार पर नामित किया गया?
गांव में चयन प्रक्रिया की सूचना मिलने पर ग्रामीण सुबह से ही जुटने लगे थे। लोगों को उम्मीद थी कि इस बार वर्षों से लंबित मामला समाप्त होगा। ग्रामीण अपने जरूरी कामकाज छोड़कर मौके पर पहुंचे थे। एडीओ पंचायत अरविंद सिंह एवं ग्राम पंचायत अधिकारी साहब सिंह की मौजूदगी में लोग चयन प्रक्रिया शुरू होने का इंतजार करते रहे। लेकिन जिला स्तरीय अधिकारी के नहीं पहुंचने की जानकारी मिलने के बाद प्रक्रिया स्थगित कर दी गई।
पहले से ड्यूटी लगी थी तो नामित किस आधार पर किया गया?
इस पूरे मामले में जिला क्रीड़ा अधिकारी की ड्यूटी को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि उनकी ड्यूटी पहले से ही दूसरी जगह निर्धारित थी, तो उन्हें कोटे की दुकान के चयन के लिए किस आधार पर नामित किया गया? क्या नामित करने वाले अधिकारियों को उनकी पूर्व निर्धारित ड्यूटी की जानकारी नहीं थी? यदि जानकारी थी, तो ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की गई कि चयन प्रक्रिया निर्धारित तिथि पर पूरी हो सके?
बार-बार तिथि निर्धारित होने और फिर प्रक्रिया स्थगित होने से प्रशासनिक समन्वय तथा पूर्व तैयारी पर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि, इस संबंध में संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना बाकी है।
पांचवीं बार तारीख, लेकिन नतीजा फिर शून्य!
मनकपड़ा गांव में कोटे की दुकान के चयन का मामला लंबे समय से लंबित है। 14 मई 2025 को प्रकाशित खबर में चयन प्रक्रिया के दौरान पात्रता को लेकर विवाद और ग्रामीणों के विरोध के कारण आवंटन नहीं हो पाने का उल्लेख किया गया था। वहीं, 9 जुलाई 2025 की खबर में दुकान एक वर्ष से अधिक समय से रिक्त होने और चयन के दौरान हंगामे के चलते बैठक स्थगित होने की जानकारी सामने आई थी।
पहले विवाद और विरोध के कारण चयन नहीं हो सका, जबकि इस बार अधिकारी की अनुपस्थिति के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई। लगातार चयन प्रक्रिया पूरी नहीं होने से ग्रामीणों की परेशानी बढ़ती जा रही है।
कामकाज छोड़कर पहुंचते हैं ग्रामीण, फिर लौटना पड़ता है खाली हाथ
चयन प्रक्रिया की सूचना गांव में पहले ही दे दी जाती है। इसके बाद ग्रामीण अपने जरूरी कामकाज छोड़कर निर्धारित स्थान पर पहुंचते हैं। घंटों इंतजार करने के बाद जब उन्हें पता चलता है कि चयन प्रक्रिया स्थगित कर दी गई है, तो उन्हें निराश होकर वापस लौटना पड़ता है।
मजदूरी करने वाले लोगों के लिए यह परेशानी और गंभीर हो सकती है, क्योंकि काम छोड़ने से उनकी रोजी-रोटी प्रभावित होती है। सवाल है कि संबंधित अधिकारियों की उपस्थिति सुनिश्चित किए बिना चयन की तारीख निर्धारित क्यों की जाती है? क्या ग्रामीणों के समय और श्रम की कोई अहमियत नहीं है?
दूसरे गांव से राशन लेने की मजबूरी
कोटे की दुकान का चयन लंबित रहने से ग्रामीणों को राशन प्राप्त करने के लिए दूसरे गांव जाना पड़ रहा है। इससे विशेषकर बुजुर्गों, महिलाओं और जरूरतमंद कार्डधारकों को परेशानी उठानी पड़ती है। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि इस बार चयन प्रक्रिया पूरी होने से समस्या का समाधान होगा, लेकिन उन्हें एक बार फिर इंतजार करना पड़ रहा है।
प्रशासन से उठ रहे सीधे सवाल
- जिला क्रीड़ा अधिकारी की पूर्व निर्धारित ड्यूटी के बावजूद उन्हें चयन प्रक्रिया के लिए किस आधार पर नामित किया गया?
- क्या नामित करने से पहले उनकी उपलब्धता की पुष्टि की गई थी?
- पहले की बैठकों में चयन नहीं हो पाने के कारणों की समीक्षा की गई या नहीं?
- ग्रामीणों को बार-बार बुलाकर वापस भेजने की स्थिति में जवाबदेही किसकी होगी?
- अगली तिथि पर चयन प्रक्रिया पूरी कराने के लिए प्रशासन क्या ठोस कदम उठाएगा?
अब तारीख नहीं, समाधान चाहते हैं ग्रामीण
मनकपड़ा गांव में कोटे की दुकान का मामला अब केवल चयन की तारीख तक सीमित नहीं रह गया है। यह प्रशासनिक समन्वय, पूर्व तैयारी और ग्रामीणों के समय की अहमियत से भी जुड़ा है। ग्रामीणों की अपेक्षा है कि अगली तिथि निर्धारित करने से पहले संबंधित अधिकारियों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए और पारदर्शी तरीके से चयन प्रक्रिया पूरी कराई जाए।
सबसे बड़ा सवाल यही है—जब चयन की तारीख तय होने के बाद भी प्रक्रिया पूरी नहीं हो पा रही है, तो जवाबदेही किसकी होगी और ग्रामीणों को राहत आखिर कब मिलेगी?




