45 टीमों ने कराया पंजीकरण, विधायक कैलाश आचार्य ने फीता काटकर किया प्रतियोगिता का शुभारंभ
चकिया। श्रीकृष्ण की बरही के उपलक्ष्य में चकिया की ऐतिहासिक कजरी प्रतियोगिता का गुरुवार को उपजिलाधिकारी परिसर स्थित वटवृक्ष के नीचे भव्य शुभारंभ हुआ। क्षेत्रीय विधायक कैलाश आचार्य ने फीता काटकर प्रतियोगिता का उद्घाटन किया। इस दौरान लोकगीत और कजरी की स्वर लहरियों से पूरा परिसर गूंज उठा। ऐतिहासिक कजरी महोत्सव की 113 वर्षों पुरानी परंपरा में इस वर्ष कुल 45 टीमों ने पंजीकरण कराया है।
चकिया की पहचान बन चुकी इस कजरी प्रतियोगिता का आयोजन लतीफशाह मेला और भगवान श्रीकृष्ण की बरही के अवसर पर परंपरागत रूप से किया जाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार इसकी शुरुआत वर्ष 1914 में हुई थी। प्रारंभिक दौर में यह आयोजन बिरहा प्रतियोगिता के रूप में जुड़ा रहा, जो समय के साथ विराट कजरी एवं लोकगीत महोत्सव का रूप ले चुका है। वर्ष 2014 में इस परंपरा का शताब्दी वर्ष मनाया गया था।
कजरी महोत्सव केवल संगीत प्रतियोगिता नहीं, बल्कि चकिया की लोक-सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सद्भाव की परंपरा का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। पिछले वर्षों में भी पूर्वांचल के विभिन्न जिलों के साथ बिहार से कलाकार इस प्रतियोगिता में भाग लेते रहे हैं।
वटवृक्ष के नीचे सजता है कजरी का मंच

चकिया तहसील परिसर के उपजिलाधिकारी आवास परिसर स्थित वटवृक्ष के नीचे होने वाली यह प्रतियोगिता वर्षों से स्थानीय लोगों के आकर्षण का केंद्र रही है। कजरी गायन में ग्रामीण जीवन, प्रेम, सामाजिक सरोकार, देशभक्ति, प्रकृति और समसामयिक विषयों को लोकभाषा और पारंपरिक धुनों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। यही वजह है कि हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग देर रात तक प्रतियोगिता का आनंद लेने पहुंचते हैं।
वर्ष 2023 की प्रतियोगिता के दौरान भी बारिश के बावजूद बड़ी संख्या में श्रोता और कलाकार कार्यक्रम में डटे रहे थे। उस समय विधायक कैलाश आचार्य ने इस परंपरा को आजादी से पहले से चली आ रही ऐतिहासिक विरासत बताते हुए इसे संरक्षित करने की आवश्यकता पर जोर दिया था।
निर्णायक मंडल में अनुभवी लोग
कजरी प्रतियोगिता में प्रस्तुतियों का मूल्यांकन करने के लिए मुसे मुहम्मद जानी, मनोज द्विवेदी मधुर और हरिवंश बवाल को निर्णायक मंडल में शामिल किया गया है। कलाकारों की गायन शैली, सुर, लय, ताल, प्रस्तुति और विषय-वस्तु सहित विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखकर प्रतियोगिता का मूल्यांकन किया जाएगा।
कार्यक्रम में पूर्व विधायक शिव तपस्या पासवान, एसआरबीएस के एचडी श्याम जी सिंह, चेयरमैन गौरव श्रीवास्तव, नागेश पांडेय, कैलाश जायसवाल, संदीप गुप्ता और राघवेन्द्र प्रताप सिंह सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
कार्यक्रम का संचालन आशुतोष मिश्रा ने किया।
लतीफशाह मेले से जुड़ी है परंपरा
चकिया का लतीफशाह मेला भी इस सांस्कृतिक आयोजन की पृष्ठभूमि का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार पारंपरिक रूप से मेले के पहले दिन बाबा लतीफशाह की दरगाह पर आयोजन, दूसरे दिन चकिया नगर में कजरी महोत्सव और तीसरे दिन कुश्ती दंगल जैसे कार्यक्रमों की परंपरा रही है। इस मेले को सामाजिक एवं सांस्कृतिक सद्भाव की परंपरा से भी जोड़ा जाता रहा है।
इस प्रकार 1914 में शुरू हुई कजरी की यह परंपरा बदलते समय के साथ अपने स्वरूप में बदलाव के बावजूद आज भी कायम है। 113वें वर्ष में 45 टीमों की भागीदारी यह बताती है कि लोकगीत और कजरी की यह विरासत नई पीढ़ी के बीच भी अपनी जगह बनाए हुए है।




