बिहार का ट्रांसफार्मर, यूपी की बिजली और टंकी पर समरसेबल, जिम्मेदार कौन?
इलिया (चंदौली)। क्षेत्र के घुरहुपुर स्थित बौद्ध स्थल पर स्थापित पेयजल टंकी और वहां की विद्युत व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पहाड़ के ऊपर बनी पानी की टंकी तक बिजली पहुंचाने के लिए जिस विद्युत लाइन का उपयोग किया जा रहा है, उसकी वैधता और विभागीय स्वीकृति संदिग्ध दिखाई दे रही है। इतना ही नहीं, इसी सप्लाई से पानी टंकी पर लगा समरसेबल पंप भी संचालित किया जा रहा है, जबकि मौके पर नियमित विद्युत कनेक्शन होने के संबंध में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।

ग्रामीणों के अनुसार घुरहुपुर बौद्ध स्थल तक बिजली पहुंचाने के लिए लगभग 13 विद्युत पोल लगाए गए हैं तथा 25 केवीए का ट्रांसफार्मर स्थापित किया गया है। हैरानी की बात यह है कि लगाए गए कई पोलों पर बिहार राज्य से संबंधित पहचान चिन्ह और पेंटिंग दिखाई देती है। वहीं ट्रांसफार्मर के संबंध में भी स्थानीय स्तर पर बिहार से लाए जाने की चर्चा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि ट्रांसफार्मर और पोल दूसरे राज्य से लाए गए हैं तो उनकी स्थापना किस विभाग की अनुमति से की गई और उनका अभिलेख किस कार्यालय में उपलब्ध है।

मामले का दूसरा और अधिक गंभीर पक्ष पहाड़ के ऊपर बनी पानी की टंकी से जुड़ा है। ग्रामीणों का कहना है कि टंकी पर लगे समरसेबल पंप को इसी विद्युत लाइन से चलाया जाता है। यदि समरसेबल के नाम से विधिवत बिजली कनेक्शन स्वीकृत है तो उसका उपभोक्ता संख्या, बिल भुगतान और विभागीय अभिलेख सार्वजनिक होने चाहिए। वहीं यदि कोई वैध कनेक्शन नहीं है और सीधे लाइन से बिजली लेकर समरसेबल संचालित किया जा रहा है तो यह विद्युत नियमों का उल्लंघन माना जाएगा।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पानी टंकी का निर्माण लाखों रुपये की लागत से कराया गया था ताकि बौद्ध स्थल पर आने वाले पर्यटकों और आसपास के ग्रामीणों को पेयजल सुविधा मिल सके। लेकिन लंबे समय से पानी की आपूर्ति प्रभावित रहने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। अब जब बिजली आपूर्ति और समरसेबल संचालन को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो लोग पूरे प्रकरण की जांच की मांग कर रहे हैं।
इस मामले में सबसे बड़ा प्रश्न जिम्मेदारी का है। यदि ट्रांसफार्मर और लाइन का निर्माण विभागीय स्वीकृति से हुआ है तो संबंधित विभागों के अधिकारियों को इसकी पूरी जानकारी होनी चाहिए। वहीं यदि किसी संस्था, समिति अथवा अन्य माध्यम से यह कार्य कराया गया है तो उसके दस्तावेज और स्वीकृतियां भी उपलब्ध होनी चाहिए। लेकिन जब स्थानीय स्तर पर पूछताछ करने पर संबंधित अधिकारियों द्वारा जानकारी न होने की बात कही जा रही है तो संदेह और गहरा जाता है।
चकिया विद्युत विभाग के एसडीओ संतोष सिंह से इस संबंध में जानकारी लेने पर उन्होंने बताया कि उन्हें इस मामले की कोई जानकारी नहीं है तथा विस्तृत जानकारी जिला कार्यालय स्तर से प्राप्त की जा सकती है। एसडीओ के इस बयान के बाद यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि यदि स्थानीय विद्युत अधिकारियों को ही इसकी जानकारी नहीं है तो फिर ट्रांसफार्मर स्थापना, लाइन निर्माण और बिजली आपूर्ति का कार्य किसकी निगरानी में हुआ।
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिला प्रशासन, विद्युत विभाग तथा संबंधित विकास विभागों को संयुक्त रूप से पूरे मामले की जांच करानी चाहिए। जांच में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि ट्रांसफार्मर किस योजना के तहत लगाया गया, लाइन निर्माण की स्वीकृति किसने दी, पानी टंकी पर विद्युत कनेक्शन वैध है या नहीं तथा समरसेबल संचालन का खर्च किस मद से वहन किया जा रहा है।
फिलहाल घुरहुपुर बौद्ध स्थल की बिजली व्यवस्था और पानी टंकी पर चल रहे समरसेबल को लेकर उठे सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है। ऐसे में क्षेत्रीय जनता यही पूछ रही है कि यदि सब कुछ नियमानुसार हुआ है तो अभिलेख सामने क्यों नहीं लाए जा रहे हैं, और यदि अनियमितता हुई है तो आखिर इसका जिम्मेदार कौन है? प्रशासनिक जांच ही इन सवालों के जवाब दे सकती है।




