जिला पंचायत के कार्यों में एनएमएमएस जारी, ग्रामीण बोले- “काम आसमान में हो रहा है क्या?”
चन्दौली एक्सप्रेस | शहाबगंज , शहाबगंज विकास खंड में मनरेगा कार्यों को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस बार आरोप ग्राम पंचायत या क्षेत्र पंचायत तक सीमित नहीं है, बल्कि जिला पंचायत द्वारा कराए जा रहे कार्यों पर भी अनियमितताओं की चर्चा तेज हो गई है।

मामला ग्राम पंचायत बरहुआ का है, जहां जिला पंचायत की ओर से वित्तीय वर्ष 2025-26 में गांधीनगर में चकिया-सैदुपुर मार्ग से मंदिर तक चकरोड पर मिट्टी कार्य तथा कुतबुद्दीन के खेत से शाहपुर तक चकरोड पर मिट्टी कार्य स्वीकृत कराया गया था। सूत्रों के अनुसार दोनों कार्यों पर पिछले वित्तीय वर्ष में लगभग पांच लाख रुपये का भुगतान भी हो चुका है।
हैरानी की बात यह है कि चालू वित्तीय वर्ष में भी इन्हीं दोनों कार्यों पर 238 मनरेगा मजदूरों की मस्टररोल जारी है और प्रतिदिन एनएमएमएस के माध्यम से ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज की जा रही है। जबकि स्थानीय लोगों का दावा है कि मौके पर किसी भी दिन मजदूरों द्वारा कार्य करते नहीं देखा गया।

स्थलीय निरीक्षण के दौरान ग्रामीणों ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा, “भइया, हम लोग तो कभी इन चकरोडों पर मजदूरों को काम करते नहीं देखे हैं। हो सकता है ठेकेदार धरती पर नहीं, आसमान में चकरोड बनवा रहा हो। धरातल पर काम होता तो दिखाई देता, लेकिन अगर आसमान में हो रहा है तो हमारी नजर वहां तक नहीं पहुंचती।”
ग्रामीणों का कहना है कि यदि वास्तव में कार्य नहीं हो रहा है और केवल कागजों व एनएमएमएस के सहारे भुगतान की तैयारी की जा रही है, तो यह मनरेगा की पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। लोगों ने मांग की है कि जिला प्रशासन, सीडीओ और संबंधित विभाग के अधिकारी मौके पर जांच कराएं तथा एनएमएमएस फोटो, मस्टररोल और कार्यस्थल की वास्तविक स्थिति का मिलान कराएं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मौके पर काम नहीं दिख रहा, तो प्रतिदिन दर्ज हो रही मजदूरों की उपस्थिति और जारी मस्टररोल किस आधार पर संचालित हो रही है? जनता जवाब चाहती है कि कहीं मनरेगा की मजदूरी और सरकारी धन सिर्फ कागजों में ही तो नहीं बहाया जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि लगता है अब मनरेगा कार्यों की गुणवत्ता और प्रगति का पैमाना धरातल नहीं, बल्कि कमीशन का प्रतिशत बन गया है। तभी तो जहां जनता को चकरोड नहीं दिख रहा, वहीं कागजों में सब कुछ चमचमाता नजर आ रहा है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर संबंधित जेई की निगाह मजदूरों और काम पर है या फिर सिर्फ फाइलों के आंकड़ों पर?
मनरेगा कार्यों में तकनीकी सत्यापन और निगरानी की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संबंधित कनिष्ठ अभियंता (जेई) की होती है। ऐसे में जब कार्यस्थल पर गतिविधियां दिखाई नहीं दे रही हैं और दूसरी ओर ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज हो रही है, तो तकनीकी निगरानी की व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि नियमित निरीक्षण और सत्यापन किया जा रहा होता, तो धरातल और अभिलेखों में इतना बड़ा अंतर दिखाई नहीं देता।
क्षेत्र में चर्चा है कि आखिर एनएमएमएस फोटो, मस्टररोल और कार्य की प्रगति रिपोर्ट किस आधार पर तैयार की जा रही है। यदि कार्य वास्तव में हो रहा है तो उसे सार्वजनिक रूप से दिखाया जाए, और यदि नहीं हो रहा है तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जाए।
ग्रामीणों ने मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग करते हुए कहा है कि दोनों कार्यों की माप पुस्तिका (एमबी), एनएमएमएस फोटो, मजदूरों की उपस्थिति, भुगतान विवरण और मौके की वास्तविक स्थिति का मिलान कराया जाए। ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सरकारी धन का उपयोग धरातल पर हुआ है या केवल कागजों में विकास की तस्वीर बनाई जा रही है।
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और मनरेगा विभाग इस पूरे मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं। क्योंकि सवाल सिर्फ दो चकरोडों का नहीं, बल्कि मनरेगा की पारदर्शिता, सरकारी धन के उपयोग और ग्रामीणों के भरोसे का भी है। यदि जांच हुई तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं, और यदि नहीं हुई तो लोगों के मन में उठ रहे सवाल और गहरे होते जाएंगे।




